Followers

Tuesday, April 15, 2014

आप , तुम और मैं

आप से हुए तुम 
तुम से हुआ ऐसा इज़हार 
कि हमको हो गया तुमसे प्यार 
रहने लगी हर पल तुम्हारी सोच 
और तुम्हारा ही ख्याल 

किताबों में नज़र आने लगे तुम 
बातों में याद आने लगे तुम 
होने लगी रातों को बातें 
और ख्वाबों में प्यारी मुलाकातें 

दौर आया कसमों और वादों का 
और न बिछड़ने के इरादों का 
कभी आरजू , कभी तमन्ना हो गयी तुम 
अब तो ज़िन्दगी की हर ख़ुशी हो गयी तुम 

यादों की घटायें  छाने लगीं
मुहब्बत के बादल बरसने लगे 
हर इक राज़  के हो गए तुम हमराज़
और मैंने काटा तन्हा सफ़र 
क्योंकि हो न सके तुम हमसफ़र 
हमसफ़र ! हमसफ़र ! हमसफ़र  ! 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
2nd Mar. 04 '211'

हिम्मत थी किसी और की

हिम्मत थी किसी और की 
बढ़ गया हौसला किसी और का 
ज़माने से खुद तो लड़ा ही 
मुझे भी लड़ना सिखा दिया 
खुद से रूठा , दुनिया से रूठा 
अपनों से भी रूठ गया 
बस इतनी सी बात के लिए - 

मैं खुश हूँ कि नहीं 
मेरे लवों पे मुस्कान है या नहीं 
मेरी आँखों में रोशनाई है या नहीं 
बस उल्फत की इक चमक 
पाने के लिए मेरी आँखों में !!! 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
15th May. 02, '210'

ऐ वतन परस्तो

ऐ वतन परस्तो
बांध लो सर पे कफन
तोड़ दो तुम सारे बंधन
मिटा दो सारी नफरतें
मुल्क में हो सिर्फ अमन
ज़र्रा -ज़र्रा वतन से प्यार करे
टुकड़ा-टुकड़ा वतन से मुहब्बत करे
भाई - भाई से गले मिले
एक माँ से कभी कोई बेटा
जुदा न हो
मुल्क की हर गली, नुक्कड़
मोहल्ले में अमन हो .
अमन हो ! अमन हो ! अमन हो !

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
26th  May. 02, '208'

आज फिर लिखा

आज फिर लिखा 
मेरी क़लम ने तुम्हें 
फिर उठे जज़्बात 
फिर हुआ अहसास 
शायद ज़िन्दगी फिर हुयी 
आज न जाने क्यूँ उदास 

दोस्त तुम फिर याद आये 
वो साँसें, वो आन्हें, वो झरोखे 
सब कुछ बार -बार याद आये 
वो हाथों में हाथ और 
रस्ते में रोना याद आये 

वो माजी की बातें और 
कल के सपने भूल न पाए 
यहाँ तक कि फिर उठा 
वो जान से प्यारा 'नया दर्द'

पूरी हो वो प्यारी तमन्ना 
और हमारा सफ़र आसान हो 
ऐ हमसफ़र - ऐ हमसफ़र 

आज तन्हा है 'अजनबी' 
बाहों में लेकर रुला दो मुझे 
और हमेशा के लिए 
दूर कर दो तन्हाई - तन्हाई 

- मुहम्मद शाहिदमंसूरी 'अजनबी'
10th Dec. 04 '207'
This poem is dedicated to my beloved Aneesa , who come in my life very quickly plz..plz...

कभी यक़ीन ही नहीं हुआ

कभी यक़ीन ही नहीं हुआ
मेरे लिए कोई इतना
कर सकता है
शाम को सहर और
सहर को शाम
कह सकता है -
पागलपन की हद तक
उसने माना है मुझे
यहाँ तक कि
मेरे इशारों पे भी
चल सकता है
मेरे दिल में जगह, बनाई है
उसने
अब तो-
क़लम का हिस्सा भी
हो गया है
मैं अजीब तो वो भी
अजीब हो गया है !!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
20th June. 05,  '206'

आसमानों में उड़ने की

उम्मीद है - 
आसमानों में उड़ने की 
ज़िन्दगी से लड़ने की 
कुछ ऐसा कर गुजरने की 
जो दे जाए लम्हा भर सुकून 
और एक टुकड़ा हसीं ज़िन्दगी 

मगर न जाने क्यूँ 
टूट रहे हैं वादे 
बिखर रही है ज़िन्दगी 
डगमगा रहे हैं ख्वाब 
लगता है कुछ भी न रहा अपना 

कभी खुद से हूँ नाराज़ तो 
कभी औरों से हूँ नाराज़ 
सिमट सा गया कारवां 
ठहर से गए ख्यालात 
कुछ पाने के हौसले जाते रहे 
कुछ खोने का डर भी न रहा 
न जाने क्या हुआ - 

अभी भी उम्मीद का चिराग 
जला हुआ  है 
कोशिशें ज़िन्दा हैं ! 
'अजनबी' उठो ! जागो !
तुम्हारा वजूद तुम्हें पुकार रहा है 
कुछ कर गुजरने का बाट जोह रहा है 
कसम लो और करो पागलपन 
हमेशा ज़िन्दगी का शाहिद होने के लिए  !!! 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
1st  Jan. 05 '205'
Dedicated to Pagalpan

कहते हैं मुहब्बत करने वाला

कहते हैं मुहब्बत करने वाला
अपनी प्रेयसी से
बिछड़ते वक़्त रोने लगता है
मगर
न जाने वो कौन था
न दोस्त, न भाई, न मेरी प्रेयसी
न कोई मुश्किल से मिलने वाला
फिर भी
जब हम दूर हुए
दिल में अजीब सा होने लगा
लगा मेरे पास ही रहे वो
दूर न जाए
आँखों में आंसू छलछला आए
फिर भी न समझ सका
कौन था वो ?
कौन सा रिश्ता था उससे
या तो सब रिश्ते थे
या दिल का रिश्ता था !!!!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
10th Nov. 04, '204'

कभी कितनी हलचलों से भरी थी ज़िन्दगी

कभी कितनी हलचलों से भरी थी ज़िन्दगी 
मगर आज कितनी खामोश है ज़िन्दगी 

न चैन है, न सुकून है, न करार है न प्यार है 
बस खिजां के फूल सी हो गयी है ज़िन्दगी 

कभी यारों की हंसी के दरमियाँ रहते थे हम 
अब तो साक़ी के पैमाने में कटती है ज़िन्दगी 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
25th May. 04, '203'

Dedicated to my enemy.


तरह-तरह की आवाजें

तरह-तरह की आवाजें
और आने जाने की
लगातार हलचल
मेरे और उसके बीच
बातों का एक लम्बा सिलसिला
कभी मिलन और कभी
बिछड़ने की बातें
कभी इरादे, कभी वादे
कभी माजी की मुलाकातें
कभी पुरानी यादें

न चाहते हुए भी तोड़ना पड़ा
अनजान वक़्त के लिए छोड़ना पड़ा
मैं भी मुड़- मुड़ कर देखता रहा
वो भी मुड़-मुड़ कर देखता रहा
टूटा सिलसिला, उठा एक गुबार
उस गुबार में गुम हो गया मेरा यार
कभी क़दम बढ़े, कभी क़दम रुके
मगर क्या करता ..........................!!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
10th Nov. 04, '202'


हम तुम और वो वादियाँ

हम तुम और वो वादियाँ 
और हवाओं के झोंके 
ऐसे आलम में
हम दोनों के हाथों में हाथ 
और तेरे आँचल का 
हवा में लहराना 
वो दो नज़रों का मिलना 
और हया के साथ झुकना 

वो पल भर में,
ज़िन्दगी की सारी खुशियाँ 
लगा जैसे दामन में 
अब तो जगह ही नहीं 
शाम की हल्की सी तारीकी 
मगर ज़िन्दगी की 
कभी ख़त्म न होने वाली सुबह 

तेरे लव, तेरे आरिज, तेरी आँखें 
और वो सबसे प्यारी तबस्सुम 
शायद वो प्यार ही था, प्यार 

यार, हाय वो प्यारा सा प्यार 
नज़र न लगे ऐसे प्यार को 
बढ़े उम्र , और गहरे हों रिश्ते 
बस ताक़यामत आये आज का दिन !!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
5th Oct. 04, '200'

This poem is dedicated to that day, YOU put first step in my life........!

वो हमराज़ था तुम हमसफ़र हो

वो हमराज़ था तुम हमसफ़र हो 
ज़िन्दगी अब तुम मेरी नज़र हो 

जिससे गिरते हैं खुशियों के फूल सदा 
हमनशीं तुम तो चमन के वो शजर हो 

तेरी आँख देख के हर कोई ये कह दे 
जुरूर तुम किसी के प्यार से तर-बतर हो

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
24th May. 04 , '199'

अलविदा -अलविदा -अलविदा

अलविदा -अलविदा -अलविदा 
दो दिल हो रहे हैं अब ये जुदा 

ऐ मेरे हमनशीं, हमनवा, हमसफ़र 
न जा मुझे छोड़कर, न हो हमसे जुदा

न रहा अब वो शायर न रहा वो 'अजनबी' 
उजड़ गयी उसकी दुनिया वो है ग़मजदा

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
21st June. 03, '198'

कोई ख़ुशी में मुब्तिला कोई ग़मों से घिरा

कोई ख़ुशी में मुब्तिला कोई ग़मों से घिरा 
सब उसी के हैं यहाँ कोई नहीं है मेरा 

मेरे दिल की बाटी जली कुछ इस तरह 
ऐ ज़िन्दगी न रहा बाकी कोई सिरा 

हाले ज़िन्दगी क्या पूछते हो साथियो 
दर्द तो मिला खूब ख़ुशी मिलीजरा जरा 

तेरे मेरे में सिमट के रह गयी दुनिया
मेरी कसौटी पर न उतरा कोई खरा 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
24th Sep. 02, '197'

ये मुआशरा सबसे बड़ा है दुश्मन

न माँ दुश्मन है न बाप है दुश्मन 
ये मुआशरा सबसे बड़ा है दुश्मन 

प्यार लगता था कभी फूलों सा मुझे 
नसों में लिपट के पड़ा है दुश्मन 

कई पर्दों में खुद को छुपा रखा था 
हर पर्दा बन के खड़ा है दुश्मन 

मैंने खुद को बचाया उससे अक्सर 
तहे दिल तक वो बढ़ा है दुश्मन 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
1st Oct. 02, '196'

रूठा- रूठा सा है वो ज़िन्दगी से

रूठा- रूठा सा है वो ज़िन्दगी से
हर वक़्त गिला है उसे ज़िन्दगी से

शबो-रोज लूटा है उसे ज़िन्दगी ने
फिर भी प्यार है उसे ज़िन्दगी से

हर मुस्कराहट में उसके ग़म है
जाने क्या चाहता है वो ज़िन्दगी से

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
5 th Feb. 02, '194'

तन्हा इक अजनबी से मिला

तन्हा इक अजनबी से मिला
हुआ हासिल उसे इक सिला

झूम उठे नस-नस का लहू
कोई ऐसी शराब उसे पिला

ज़िन्दगी बन जाये इक नगमा
ऐ खुदा ! हमसफ़र ऐसा मिला

कभी ख़त्म न हो ऐसी खुशबू
मुहब्बत का ऐसा गुल खिला

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
10th Nov. 01, '192'

उसने अपनी आँखों में मयखाना छुपा रखा है

उसने अपनी आँखों में मयखाना छुपा रखा है 
लोग कहते हैं उसने कोई अन्जाना छुपा रखा है 

यूँ तो उसका हर क़दम माय का इक क़तरा है 
फिर भी उसने सीने में इक पैमाना छुपा रखा है 

उसके होठों के हिलने से बहार आ जाती है 
शायद लवों के दरमियाँ इक तराना छुपा रखा है 

महफिल में कहते-कहते रुक जाता है वो देखकर 
मैंने सुना है उसने इक याराना छुपा रखा है 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
12th. Dec. 02, '190'

उल्फत का सातवां चराग

इन सात चरागों से मुहब्बत की 
लौ निकल रही है 
हर एक चराग, हर एक साल को नज्र
इस वक़्त 
चाँद -तारे तो नहीं, मगर 
ढलती शाम है 
उल्फत की चांदनी है प्यार की बरसात है 
बस कुछ नहीं है, तो वो तुम नहीं हो 

तुम्हारी यादें हैं और हजरी मुलाकातें हैं 
तुम्हारा प्यार है मगर तुम नहीं हो 

यूँ तो हर इक साल की अपनी अलग 
दास्ताँ है , अलग फसाना है
मगर इस साल 
तुम्हारे उस गुलाब के दरमियाँ 
लिखा गया ये साल 
मासूम सा गुलाब ,चुप सी तुम 
और मुहब्बत से लबरेज , ये सात चराग 
बस कमी है तो तुम नहीं हो  !

हर साल लेके आये इक नया साल 
अनीसा- शाहिद की मुहब्बत बढती रहे 
साल दर साल 

क्या लिखूं ग़ज़ल, क्या लिखूं नज़्म 
जब सब कुछ ही तुम हो 
जमीं तुम हो आसमां तुम हो 
अनीसा तुम हो , शाहिद तुम हो 
बस अब क्या लिखूं 
जब मेरी दुनिया ही तुम हो !!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
5th Oct. 03, '188'

ये नज़्म वो नज़्म है. जो 5 Oct. 03, की ढलती शाम को लिखी गयी जब हम 5 Oct. 96 को पहाड़ों के ऊपर, और वादियों के दरमियाँ थे.
Yours & yours only
Shahid

ये वो 16 Oct. 03 के फूल हैं जो अपनी अलग दास्ताँ और अपनी अलग कहानी सुना रहे हैं. 16.10.03

जिस तरह Celebrate करना चाहता था, उस तरह न कर सका , खैर , प्यार, प्यार है
Everlasting  Love
Yours Forever
SHAHID
16th Oct. 03

आप कौन

दूरियां  बढ़तीं गयीं
फासले बढ़ते गए
हम तो बदले ही थे
मगर अब तो
तुम भी बदल गए !

ये मुहब्बत का सफ़र है
इसमें ऐसा ही होता है
ऐ दोस्त, इसमें खुशियाँ कम
ग़म ज्यादा होता है !

कभी सोचा न था कि
ऐसा भी दिन आएगा
जो कभी न सुना
उसे सुनने का वक़्त आएगा

सफ़र हो जायेगा भारी
ज़िन्दगी हो जाएगी बोझिल
वो लम्हा कुछ ऐसा होगा
जब सब कुछ मिट सा जायेगा !

ऐ दोस्त ! 'आप कौन' कहकर
तुमने क्यूँ किया ऐसा , क्यूँ ?
क्यूँ ? क्यूँ ? क्यूँ ? क्यूँ ?

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
1st July 04, '187'

चाहता तो था तुझे अपनी आँखों से देखूं

चाहता तो था तुझे अपनी आँखों से देखूं
और उन आँखों को अपने सीने में छिपा लूँ
मगर शायद तुझे मंजूर न था

चाहता तो था तुझसे चार प्यार की बातें करूँ
और उन प्यार की बातों को अपने दिल में समा लूँ
मगर शायद तुझे मंजूर न था

चाहता तो था तेरे हाथ मेंहदी से रचे देखूं
और उस हिना की खुशबू को दामन में ले लूँ
मगर शायद तुझे मंजूर न था

चाहता तो था बादलों के झुरमुट में पानियों के साए में देखूं
और ऐसे झुरमुट को, उस साए में समेट लूँ
मगर शायद तुझे मंजूर न था

बस उम्मीद थी कि जा के तुझसे मिलूं
और उस वस्ल को 'अजनबी' के नाम कर दूँ
मगर शायद तुझे मंजूर न था

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
2 nd Aug. 03 , '186'

Monday, April 14, 2014

सारी दुनिया को समझा तुझे न जाना

सारी दुनिया को समझा तुझे न जाना
ऐ मेरी ज़िन्दगी मेरी शहाना

दर्द मेरा बड़ा गहरा रिश्ता है
मेरी ज़िन्दगी तुम काँटों से मत सजाना

तुम्हारे हौसलों से कायम है मेरे हौसले
इन हौसलों से तुम दामन मत छुड़ाना

टूटकर हम बिखर ही क्यूँ न जाएँ 'अजनबी'
मगर मेरी ज़िन्दगी से तुम मत जाना

अफज़ल और शहाना का रिश्ता ताक़यामत कायम रहे
या खुदा मुहब्बत परस्तों को ज़माने से बचाना

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
19th Dec. 02, '184'

अगर तुम्हें ख़ुशी मिलती है

मेरे दिल को दुखा के 
अगर तुम्हें ख़ुशी मिलती है 
तो तुम्हें ये ख़ुशी 
एक बार नहीं सौ बार हासिल हो !

मेरी आँखों में अश्कों को देख के 
अगर तुम्हें ख़ुशी मिलती है 
तो तुम्हें ये ख़ुशी 
एक बार नहीं सौ बार हासिल हो !

मेरी ज़िन्दगी बिखरते हुए देख के 
अगर तुम्हें ख़ुशी मिलती है 
तो तुम्हें ये ख़ुशी 
एक बार नहीं सौ बार हासिल हो !

मुझे पल-पल मरते हुए देख के 
अगर तुम्हें ख़ुशी मिलती है 
तो तुम्हें ये ख़ुशी 
एक बार नहीं सौ बार हासिल हो !

'अजनबी' के ग़मों की छत देख के 
अगर तुम्हें ख़ुशी मिलती है 
तो तुम्हें ये ख़ुशी 
एक बार नहीं हर  बार हासिल हो !

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 



यूँ तो शबो- रोज वो पन्नों को काले किया करता है

यूँ तो शबो- रोज वो पन्नों को काले किया करता है 
लोग कहते हैं वो तो कविता लिखा करता है 

जद्दो जहद तो ज़िन्दगी का हिस्सा हुआ करता है 
जाने क्यूँ वो बार-बार किताबे-ज़िन्दगी पढ़ा करता है 

दिल में दर्द, आँखों में पानी और लव पे हल्की मुस्कराहट 
अरे जनाब मुहब्बत के सफ़र में ऐसा ही हुआ करता है 

ग़ज़ल और नज़्म लिखना तो इक बहाना है 'अजनबी'
वो शायर तन्हाईयों में हाले दिल लिखा करता है 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
6th Apr. 04  '181'


झूठे हैं दोस्त, झूठें हैं वादे, झूठा है संसार

झूठे हैं दोस्त, झूठें हैं वादे, झूठा है संसार 
एक दिल है सच्चा और झूठा है प्यार 

खुद को फ़ना किया मैंने कई बार 
मगर अफ़सोस न हुआ ऐ मेरे यार 

गुलमोहर, गुलाबों में उसने गुजारे दिन 
मेरे हिस्से में आये मुहब्बत के खार

राहे इश्क़ है संभल -संभल के चल 'अजनबी'
गर सोचोगे जीत तो पाओगे हार 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'

बेवजह क्यूँ बात बनाते हो

बेवजह क्यूँ बात बनाते हो
प्यार करते हो फिर छिपाते हो
पलकें कुछ और ही कहती हैं
तुम कुछ और ही सुनाते हो

रुख पे कुछ और निगाहों में कुछ
हक़ीकत को सामने क्यूँ नहीं लाते हो
भूल चुकी तुमको'अजनबी' ये दुनिया
यादों की गर्द को क्यूँ हटाते हो

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'

जीत लें दिल

हो दूर रिश्तों की कड़वाहट
हर लव पे हो मुस्कराहट

ख़त्म हों ये दर्दनाक हादसे
हों सराबोर मुहब्बत के प्यासे

बन्द हों नफरत की ये गोलियां
हर तरफ गूंजें प्यार की बोलियाँ

अमृतसर से लाहौर हम जाएँ और
ढेर सारे फूल प्यार के ले आयें

सरहदों पे न रहें बंदिशें
हम जाएँ और जीत लें एक दुसरे का दिल  !!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
20 th Mar. 04 '177'

Saturday, April 12, 2014

अजीब इत्तेफाक

अजीब इत्तेफाक 
अजीब बात 
नए दर्द की सालगिरह 
और 
किसी और की मुबारकबाद 

वो चर्चे नहीं, वो यादें नहीं 
वो हम नहीं, वो तुम नहीं 
तुम्हारे दिल में कुछ ख्वाब और
मेरे दिल में कुछ खयालात
शायद 
वो वक़्त ही अजीब था , जब 
मेरे पास एक नहीं 
थे सौ-सौ सवालात 
मगर 
'हाँ' कहती हुयी 'न' नहीं
थमी सी ज़िन्दगी रुकी सी ज़िन्दगी 
हाय! वो नए दर्द की चर्चा नहीं  !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
16 th Oct. 03, '176'

बड़ा सा आँगन

बड़ा सा आँगन
और दो प्यारे से फूल
कहीं निकहत कहीं इमरोज़
खुशियाँ ज्यादा और थोड़ा सा सोज़
ऐसे किलकारियों के माहौल में
अनीसा और शाहिद की खिलखिलाहटें

उन दो फूलों का
कभी मेरे क़रीब आना
कभी तुम्हारे पास जाना

अब तो रब से यही है दुआ
और यही है तमन्ना
कभी ख़त्म न हो ऐसा सफ़र
ताकयामत ज़िन्दा रहे ऐसी प्यारी
मुहब्बत का असर !!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
28 th Aug. 03 '175'

मैं जिसे प्यार करूँ

मैं जिसे प्यार करूँ
वो सिर्फ मुझे प्यार करे
और अगर
वो प्यार मुझे
सारी दुनिया से
नफरत करके दे सके
तो मैं चाहूँगा
कि वो
मेरे लिए
सारी दुनिया से नफरत करे
सिर्फ मेरे लिए
सिर्फ मेरे लिए !!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
1st Aug. 03, '174'

वो सुकूं शाम न दे सकी

वो सुकूं शाम न दे सकी 
वो सुकूं सहर न दे सका
वो सुकूं मस्जिद में मिला 

वो सुकूं उनकी यादों से न मिला 
वो सुकूं गुजरी मुलाकातों से न मिला 
वो सुकूं मस्जिद में मिला 

वो सुकूं गुलमोहर तले न मिला
वो सुकूं पलाश के पास न मिला 
वो सुकूं मस्जिद में मिला 

वो सुकूं ज़िन्दगी की रानाई में न मिला 
वो सुकूं प्यार की परछाईं में न मिला 
वो सुकूं मस्जिद में मिला 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
20th July .03, '173'

 

एक हूक सी उठती है

एक हूक सी उठती है
मगर दब के रह जाती है
ये उस जहाँ की वो आवाज़ है
जो अनकहे कही जाती है

न फिक्र है उन्हें न है भरोसा
बस अपने में गुम हैं
और एक हम जो जहाँ देखूं
बस वो ही नज़र आती है

ज़िन्दगी क्या अब तो दुश्मन है
मेरा दिल या उसका मन है
उसकी ख़ुशी देखकर ही खुश हूँ
यहाँ तो ख़ुशी बमुश्किल आती है

अजनबी राहों का अजनबी परिंदा
शायद खुद से है शर्मिंदा
बस उम्मीद की दुनिया है कायम
वरना कहाँ अपनी सुबह आती है !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
14th Oct. 02, '172 '

नया दर्द


दर्द जब नया हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब जिस्म का हिस्सा हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब एक दास्ताँ हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब दर्द न होकर कुछ और हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब खल्वत का इक सामाँ हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब दो दिलों की डोर हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब ज़िन्दगी से उठकर हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब रुसवाई से तबस्सुम में तब्दील हो जाए
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब करवटों का सहारा हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब किताबों में लिखी ग़ज़ल हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब तेरी याद दिलाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द शाम हो और सहर भी हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब सीने की धड़कन हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब सरापा हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब ख्वाबों को मिठास दे जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब पागल हो और दीवाना हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब हाथों की लकीरों में बस जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द इक क़तरा हो और समुन्दर हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब बेवजह मुस्कुराहटें ले आये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब निकहत और इमरोज़ दे जाए
तो कुछ अहसास होता है 

दर्द जब शाहिद और अनीसा को मिलाये 
 तो कुछ अहसास होता है 



दर्द जब नए साल में अजनबी हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
1st Jan. 03, '171'

चुप्पी

वो और मैं , और 
कमरे में खामोशी 
रात का सन्नाटा 
सफ़ेद रौशनी में 
चुपचाप 
दो दिलों की धडकनें
और कुछ जज़्बात 

कुछ यादों के सिलसिले 
कुछ ख़्वाबों के मकां
और कुछ ख्वाहिशों 
और तमन्नाओं का वजूद 

इक बहाने की तलाश कि
उनसे कुछ बोलेन , और 
उन्हें भी मेरे कहने का इंतज़ार 

इक अजीब सा आलम 
हम दोनों के दरमियाँ 
चुप्पी का दरीचा 
यहाँ भी बन्द और 
वहां भी चुप्पी टूटने 
कोई आसार नहीं 
बस! वो और मैं और 
कभी ख़त्म न होने वाली चुप्पी !!

- मुहम्मद शाहिदमंसूरी 'अजनबी'
19th Dec. 02 '170'

कैदे ज़िन्दगी से कहाँ इतनी फुर्सत मिलती है

कैदे ज़िन्दगी से कहाँ  इतनी फुर्सत मिलती है
ढेरों नफरतों के बाद जरा सी उल्फत मिलती है 

यादों की बौछारों से भीग जाते हैं दिल के तार 
आंसुओं की शक्ल में जरा सी दौलत मिलती है 

उसके तसव्वुर को मैंने पैकर की तरह माना है 
ज़िन्दगी की सारी रानाई उसके बदौलत मिलती है 

वो भी मिली, दुनिया भी मिली, खुशियाँ भी मिलीं 
बाद मिन्नतों के भी कहाँ ऐसी किस्मत मिलती है 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
29th Aug. 02, '169'

Friday, April 11, 2014

शहर दर शहर होते वीरान रहे

शहर दर शहर होते वीरान रहे
एक हम थे जो खुद से अनजान रहे

वो मेरे जिस्म की तलाश में था
हम उनके ताउम्र निगहबान रहे

तुम चलो साथ-साथ  साया बनकर
चाहे फिर क्यूँ न वो अहसान रहे

जिनकी धड़कन से है ज़िन्दगी मेरी
वो साथ हों तो सफ़र आसान रहे

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
20th Aug. 02, '168'

मेरे और उसके दरमियाँ इक ऐसी चीज है

मेरे और उसके दरमियाँ इक ऐसी चीज है
जो दुआओं और मिन्नतों से नहीं मिलती

खुशनसीबी में शुमार हो जाते हैं वो
जिन्हें ज़िन्दगी में ये चीज मिलती है

मेरे दिल में किया जिसने इसे पैदा
वो कोई और नहीं सिर्फ मेरी अनीसा है

धूप, शबनम, परछाईं रहे प्यार के 'शाहिद'
तड़प, बेबसी से घिरी मेरी अनीसा है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
15th June 02, '167'

प्यार पाने का नहीं खोने का नाम है

प्यार पाने का नहीं खोने का नाम है 
ज़िन्दगी अहसास नहीं जीने का नाम है 

हर इक दर्द समा जाए रगों में लहू की तरह 
इजहारे ग़म तो नाशुक्री जताने का नाम है 

उफ़ ये हिज्र की रातें और दिल की जलन 
हर इक करवट में उस दीवाने का नाम है 

निगाहों का फलसफा क्या पूछते हो 'अजनबी'
ये तो दिल की सिलवटें जताने का नाम है 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
20th Aug. 02, '166'

जां कुर्बान करने का हम में जज़्बा है

जां कुर्बान करने का हम में जज़्बा है
वतन पे मर मिटने का हम में जज़्बा है

तुम कहो तो पल में दुनिया को हिला दें
हम नौजवानों में वतन परस्ती का वो जज़्बा है

दिलों के शाखों को जो चूम आती है
मेरी क़लम की स्याही में वो जज़्बा है

राहे वतन है खुद को फ़ना कर ऐ 'अजनबी'
तुम्हारी हर इक सांस में वो जज़्बा है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
15th June 02, '164'

निगाहे भरम उठा दीजिये

निगाहे भरम उठा दीजिये 
फिर चाहे जुल्फें गिरा लीजिये 

तुमसे कुछ भी न कहेंगे सनम
बस अपना फैसला सुना दीजिये 

रूठ जाये न मुहब्बत का गुलशन 
अपने दामन में मुझको छिपा लीजिये 

इश्क़ का ज़हर पी लिया 'अजनबी'
अब मुहब्बत की कोई दवा दीजिये 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
18th July 02, '163'

सिर्फ, नाराजगी की खातिर

सिर्फ
नाराजगी की खातिर
प्यार के लिए
मुहब्बत के वास्ते
हर चीज लुटा सकता हूँ
ज़िन्दगी फ़ना कर सकता हूँ
बस तुम्हारे लिए
हाँ तुम्हारे लिए
सिर्फ तुम्हारे लिए

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
3rd Nov. 01, '162'

मेरा दिल कह रहा है

मेरा दिल कह रहा है
तुम जुरूर मिलने आओगी

मजबूरियों से करके बैर
और हालातों से अदावत
मगर
कैसे यकीं मैं कर लूं
तुम जुरूर आओगी
सौ वादे तोड़ के तुमने
इक वादा निभाया है !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
24th May 02, '160'

Composed in the Jhelam Express Train.

गहरा और गहरा मरासिम

जहाँ तुम्हारी नज़र जाए 
बस ख़ुशी नज़र आये 
खुशियों का हो सामयाना
खुशियों की हों दीवारें
हो आहट ख़ुशी की जिसमें 

 तबस्सुम के हों फूल सिवाए गुलमोहर 
इक ऐसा ही हो तुम्हारा घर
जहां उम्र का ये साल गुजर जाए 

'अजनबी' की है ये मुसलसल दुआ 
तन्हा न रहे तुम्हारा सफ़र 
अर्सों रहे इस घर से तुम्हारा 
गहरा और गहरा मरासिम  !! 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
2nd June ,02, '159'



चन्द बोतलें कतार बद्ध

चन्द बोतलें कतार बद्ध
किसी में पीला
किसी में सफ़ेद
किसी में काला पानी
धुआं सा आसमान
गर्द के गुबार में
एक अजीब सा शोर
जिस पर बहके हुए
थिरकते कदम

सारे मासूम चेहरे
लग्जिशों में तब्दील हो गए
उनके मुंह की मिठास
आज ज़हर में बदल गयी

उनके होठों तले से
दिल को चुभाने वाले
लफ़्ज़ों का
सैलाब उमड़ पड़ा  !

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
20th Nov. 01, '141'

एक दिन बुने थे कुछ सपने

एक दिन बुने थे कुछ सपने
अगली सुबह शुरू हुआ
सपने सच होने का सिलसिला
दोस्तों की दुआएं , खुद की मन्नतें
और अरमान भरा दिल लेकर
शुरू हुआ खुशियों का सफ़र
शाम आते-आते बिखर गए सपने
टूटा दिल और हम भी टूट गए

सब कुछ जाता सा रहा
भरम भी अब अपना न रहा
पहली बार न हुआ ऐसा
मेरे साथ अक्सर हुआ ऐसा

ख्वाब सजते रहे
किस्मत रूठती रही
हम ही थे एक पागल
जो उम्मीद लिए सोचते रहे

सहरा में भी कहीं होता है पानी
अरे नादां !
अब तक तुम किस जमाने में रहे !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
26th May. 02, '158'

Composed at the famous medical store of Jhansi

Thursday, April 10, 2014

किताबों से दिल न बहला तो तेरे पास चला आया

किताबों से दिल न बहला तो तेरे पास चला आया
कुछ तेरी सुनने तो कुछ अपनी सुनाने चला आया

ये प्यार का रोग है कहाँ इसकी दावा मिलती है
इसीलिए तो कुछ लम्हे बिताने चला आया

तमाम उम्र सहरा में गुजरी है अपनी
वो प्यास समंदर में वुझाने चला आया

पूरी ज़िन्दगी नाराज़ रहा वो मुझसे
आख़िरी वक़्त है मनाने चला आया

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
18th Mar. 01, '157'

मेरी कोशिशों को वादा न समझना

मेरी कोशिशों को वादा न समझना 
प्यार का जुनूं  है सितम न समझना 

हर कश्ती की मंजिल है दरिया का साहिल 
मगर हर साहिल को अपना न समझना 

अक्सर रूह जाती सी लगती है मुहब्बत में 
दिल में ऐसा होने को तड़पना न समझना 

हर इक रात ले के आती है एक नया ख्वाब 
ये तो सपना है हक़ीकत न समझना 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
5th Oct. 01, '156'

मेरे काजल ने तुमको पुकारा है

मेरे काजल ने तुमको पुकारा है
मेरी पायल ने तुमको पुकारा है
मेरे महबूब आ भी जाओ
मेरे जिस्मों जां ने तुमको पुकारा है

मेरी हर सांस तुमको पुकारती है 
मेरी हर अदा तुमको पुकारती है 
मेरे दिल के मालिक आ भी जाओ 
मेरे लव , मेरे आरिज ने तुमको पुकारा है 

दिल बहलता नहीं खुद के मनाने से
न उल्फत का कोई नग़मा सुनाने से
मेरी ज़िन्दगी के सहर आ भी जाओ
रात के हर पहलू ने तुमको पुकारा है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
2nd Apr. 02, '155'

सारी -सारी रात जागती रहती हूँ

सारी -सारी रात जागती रहती हूँ
नींद नहीं आती करवटें लेती रहती हूँ

तारे गिन -गिन कर रात गुजरती है
तेरी यादों से प्यार करती रहती हूँ

छुआ था तुमने उन चूड़ियों को कभी
उन्हीं चूड़ियों को चूमती रहती हूँ

उस रात का इक -इक अहसास ज़िन्दा है
उसी अहसास को सोचती रहती हूँ

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
3rd Dec. 2000, '154'

साकी तेरा मयखाना कितना अजीब है

साकी तेरा मयखाना कितना अजीब है 
यहाँ रकीब भी होता हबीब है 

न शिवाले न कलीसा न हरम से है गरज 
यहाँ सब इक दूसरे के करीब है 

इनसां हो के करे  इनसां की जो खिलाफत
दुनिया की नज़र में वो तो रक़ीब है 

सोजे उल्फत से निजात दिला दे कोई 
शायद नहीं ऐसा कोई तबीब है 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
8th Oct. 01, '153'
 

कल तक था मैं जिसे जानता नहीं

कल तक था मैं जिसे जानता नहीं
आज आलम ये है दुनिया पहचानता नहीं

हुआ है पहली नज़र का असर
जिसे अब तलक था मैं मानता नहीं

किया है उसने मुझे रूबरू -ए- बहार
सिवाए खिजाँ के था कुछ जानता नहीं

हर दिल अजीज़ है रुखसार पे उनके
और मुझे कोई पहचानता नहीं

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
16th Apr. 01, '152'

कुछ इस तरह सोचो मेरे बारे में

कुछ इस तरह सोचो मेरे बारे में
लोगों को खबर न हो अपने बारे में

तू   मुझे देखे और मैं तुझे देखूं
समाये हों हम दुनिया के नज़ारे में

या ख़ुदा प्यार के दरिया को ऐसा मोड़ दे
हम दोनों हों दरिया के हर किनारे में

बस इतना हौसला बुलंद कर ऐ 'अजनबी'
न जरूरत हो किसी की तेरे सहारे में

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
3rd May .01 '150'
क्यूँ  इतनी तारीकी छाई है अपनी ज़िन्दगी में 
प्यार भी करता हूँ तो तारीक ज़िन्दगी में 

खुशियों के दरीचे से निकली थी चन्द शुआयें 
खो गया उनका वजूद तारीक ज़िन्दगी में 

किताबे मुहब्बत लिखी थी तसव्वुर के आईने से 
सिमट के रह गया हर वरक तारीक ज़िन्दगी में

हर सिम्त से उट्ठी थी वफ़ा की हवाएं 
तिनका नहीं आता नज़र तारीक ज़िन्दगी में 

मौजों की अंजुमन में बैठा है "अजनबी"
क्या सोचना कल के लिए तारीक ज़िन्दगी में 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
17th Oct. 01, '149'

Composed in the truck, Returning journey from Jhansi



नई उम्मीदों '148'

नई उम्मीदों 
नई तमन्नाओं 
नई ख्वाहिशों के संग 
नए जोश के साथ 
नए शहर की 
नयी दुनिया में 
नए आग़ाज़ के 
नए अंदाज में
खूबसूरत अंजाम के लिए 
एक नया सफ़र 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
3rd Nov. 01, '148'

कुछ अशआर -8

1. यूँ गेसुओं के साए में अपने चेहरे को न छिपाया कीजिये 
    करीब न आओ मगर दूर से ही मुस्कराया  कीजिये 

2. लाख दे ज़माना  लाख पहरे मगर 
     दीवानों को मिलने से रोक न सकेगी 

3. किताबे मुहब्बत का हर उसूल उसने न पढ़ा होगा 
   वरना रोते-रोते वो हंस के दिखा देता

4. तुम क्या समझो , तुम क्या जानो 
  मुहब्बत क्या चीज होती है 
   बस इक वही समझता है मुहब्बत 
जिसकी नस-नस में मुहब्बत बसी होती है (01.04.02)

5.  न रही वो कसक ही बाकी 
   न रही वो तड़प ही ज़िन्दा 
    मुहब्बत हुयी ही रुसवा  
मुहब्बत परस्त हुए शर्मिंदा (17.06.02)

6.  ख़ुशी कहें या दर्द कहें 
   मुस्कराहट कहें या आंसू कहें 
  ज़िन्दगी तू ही बता दे आज 
तुझे क्या कहें ! क्या कहें ! (31.12.05)

7.  मेरा अपना अलग इक कायदा है 
   मगर उसका कोई फायदा नहीं 
    अशआर तो लिख दूँ  तुम्हें मगर 
   तेरे दिल में मेरे अशआर का पायदा नहीं 
 क्योंकि ................................................( 05.06.01)

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

कुछ अशआर -7

1. मैं तो तुम्हें इक पल भी भुला न पाऊंगा
    पर, तुम मुझे न भूल जाना यार
  ज़िन्दगी के सफ़र में तुम्हीं तो हो
जिसे चाहा है मैंने , मैंने ............

2. लवों को अपने हिला दो
   उल्फत का चमन महका दो
  अपनी आवाज़ से मुझे बुला दो
फिर सारी दुनिया भुला दो

3. जानकार हाले -दिल तुम्हारा
  जान गया हाले दिल अपना
  इक सांस में कह दूँ  सारा प्यार
  बस यही है अब मेरा सपना

4.  चाहे हो सुबह या
    हो चाहे प्यारी शाम
     जुवां पे आये कोई लफ्ज़
  तो आये मेरा ही नाम

5. गर होगा रब को मंजूर
तो मुलाक़ात होगी जरूर
ऐसा है मेरा यकीं और ऐसा विश्वास
कभी न कभी होंगे जरूर आपके पास

6. हम तुमसे जुदा न हों
   तुम हमसे जुदा न हो
  खुदा करे ऐसा कभी न हो

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
1st Dec. 1999

कुछ अशआर- 4

1. मत निहारो  ऐसे किसी को 
कहीं तुम्हारी उसे नज़र न लग जाए 

2. सब कुछ जानते हुए भी 
   क्यों हो तुम अनजान 
   कब जानोगी मुझे मेरी जान 
    चाहे तब तक निकल जाए शाहिद की जान 

3. अब किसे कहूं अपना और किसे पराया 
    जब तुम्हीं हो मेरे अपने तुम्हीं मेरे पराये 

4. काश अगर ऐसा होता 
    मैं तुम्हें सोचता तो तुम्हें देखता 

5. ग़म में हो तुम 
     ग़म में हैं हम 
    हम दोनों के ऊपर 
    दुनिया के हैं ये सितम 

6.  मेरी जान से प्यारी है जो जान 
   उसी जान पे कुर्बान है मेरी जान 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
27th Feb. 2000

कुछ अशआर- 2

1. दिन को न दिन कहता हूँ
   रात को न रात कहता हूँ
  कहता हूँ तो बस तुझे
  अपनी ज़िन्दगी की सुबह कहता हूँ

2. यादों ने छूकर तेरे दिल को
     पकड़ लिया होगा दामन तेरा
   जिसमें तस्वीर होगी तेरी
   और चेहरा होगा मेरा

3. क्या कहूँ तुम से
    क्या लिखूं तुम पर
   जब,
  मेरे दिल के ही एक  हिस्से हो
तुम! तुम! तुम!

4. कितना आसान है
  सपनों की दुनिया में जीना
  मुश्किल है तो,
 टूटे हुए सपनों का ग़म पीना

5. सामने जब वो आ गए मेरे
   देख के उनको अपना सर झुकाना पड़ा
   वो मेरे करीब थे बहुत
   न जाने क्यूँ  दूर से दिल बहलाना पड़ा

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी" 

Wednesday, April 09, 2014

कुछ अशआर- 1

1.  आज वो है खुशकिस्मत 
     जिसे कहते हैं आपका 
     आज आपके दामन में हों लाख खुशियाँ 
     पर न हो कोई ग़म 
    बस यही दुआ है "अजनबी" की 
आपके लिए- आपके लिए 

2. भेज रहा हूँ कुछ पंक्तियाँ 
  इन्हें समझना शाहिद 
लगाना इसे अपने दिल से 
न हो जाना इससे "अजनबी"

3. जब भी मेरे पास तन्हाई होती है 
  तू मेरे करीब होती है 

4. जिसे आदर्श बना के बनाते हैं शे'र 
बैठा है जब वो सामने तो कितनी है देर 

5. दर्द कभी लगता है 
तो कभी चुभता है 
लेकिन 
एक पल में 
जिस्म का हिस्सा बन जाता है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

2nd June, 1999

कुछ और आशआर -0

1. तुम धरती के माफिक, मैं गगन के नुमा
    इस जहां में रहे बस तेरा और मेरा ही बयां

2. जब थे अकेले
तो सोचते थे कब होंगे दुकेले
आज जबकि हो गए दुकेले
तो रोते हैं अकेले

3.  नहीं पी है मैंने शराब
फिर भी मैं नशे में हूँ
शायद ये नशा प्यार का नशा है

4. जितने सावन गुजर गए
वो तो सारे निकल गए
पर आ रहा है जो अब
इसे याद रखना हमेशा -हमेशा

5. मैं हूँ एक डोरी की तरह, तू है पतंग के सामान
 बस ऐसे ही पकड़े रहें हम दोनों एक दूसरे की कमान

6. हम चाहते हैं सिर्फ तुम्हें
 अब साथ निभाने से इनकार मत करना

7. उसका सनम उसे ले जाएगा अपने साथ
पर , अजनबी यूँ ही देखता रहेगा

8. ख़ुशी -ख़ुशी से दिन बीते और ख़ुशी-ख़ुशी से रात
पर पल-पल याद रखना मेरी हर बात

9. अजनबी से मिलकर
अजनबी भी
हो जाते हैं दोस्त
ये तो क़िस्मत है उनकी
जो, मेरे साए में हैं

10. न ही मुझे है भूख और न ही प्यास
       है अगर तो सिर्फ तेरी ही आस

11.वो बचपन की बातें करके कभी याद
      आती होगी जरूर आपको मेरी याद

देखते -देखते, उनको आईना

देखते -देखते, उनको आईना
न जाने क्या हुआ 
कि
अपने काजल से 
आईने पे ही 
मेरा नाम लिख दिया 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
14 Mar. 02 , '147'

एक शायर

एक शायर 
और कई हवाएं 
दूर तक फैला सन्नाटा 
हर सू तन्हाईयों के मकाँ 
है ख़ामोशी उनमें बयां 
न कोई चरिंदा 
न कोई परिंदा 
बस एक चाँद
और चाँद में उसकी महबूबा 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
16th Mar. 02, '146'

खुशियों का हो रास्ता

खुशियों का हो रास्ता
खुशियों का हो गुलशन
हों फूल ख़ुशी के उसमें
खुशबू हो ख़ुशी की जिसमें
कुछ ऐसा हो इस साल
जो याद रहे सालों साल

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
2nd Jan. 02, '144'

पूरे चाँद की रात

पूरे चाँद की रात 
वो और उसके तसव्वुरात 
चुपके-चुपके 
रात भर बातें करते रहे 
कभी नाराज़ हुए 
कभी  मुस्कुराए
यूँ चला ये सिलसिला 
कि सुबह के तारे निकल आये
मगर फिर भी 
अधूरा रहा सफ़र 
न पूरा हुआ ये सिलसिला 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
31st Oct., 01, '145'

ऐसी प्यारी- मेरी माँ है

खुद ग़म को सह के
हमको ख़ुशी देती है
ऐसी प्यारी- मेरी माँ है
मेरे दिल की धड़कन हो  जैसे
 ऐसी प्यारी- मेरी माँ है

गुलशन में हों जैसे फूल
दुनिया में ऐसी मेरी माँ है
है फूल की जो महक
ऐसा उसका प्यार है
फलक का कोई सितारा हो जैसे
ऐसी प्यारी- मेरी माँ है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
2nd Jan. 02, '143'

तारीक राहें

तारीक राहें
अजनबी रास्ता
न हमसफ़र
न कोई साया
जब भी सोचा
तेरा ही चेहरा नज़र आया
चलते - चलते जब थक गया
खुद को तेरे साथ पाया
फिर भी न आई मंजिल नज़र
तन्हाईयों को हाले दिल सुनाया

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी "

28th Feb. 2002 , '142'

Friday, April 04, 2014

मुद्दत बीत गयी



एक मुद्दत बीत गयी
उनको देखे हुए
मगर अब भी
मौजूद है
वो मुस्कराहट
मेरी आँखों में
मुस्काये थे
मुझे देखकर
जो कभी .
-    - मुहम्मद शाहिद मंसूरी “अजनबी”
23rd Jan. 02 ‘140’

पसंद न आये

लगती हैं तुझे अच्छी
चीजें अब तो तो खट्टी
पसंद न आये तुझे
कोई भी चीज मीठी
ये क्या हुआ ?
कब हुआ ?
कैसे हुआ ?
मैंने न जाना
तूने न जाना

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"