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Tuesday, April 15, 2014

आज फिर लिखा

आज फिर लिखा 
मेरी क़लम ने तुम्हें 
फिर उठे जज़्बात 
फिर हुआ अहसास 
शायद ज़िन्दगी फिर हुयी 
आज न जाने क्यूँ उदास 

दोस्त तुम फिर याद आये 
वो साँसें, वो आन्हें, वो झरोखे 
सब कुछ बार -बार याद आये 
वो हाथों में हाथ और 
रस्ते में रोना याद आये 

वो माजी की बातें और 
कल के सपने भूल न पाए 
यहाँ तक कि फिर उठा 
वो जान से प्यारा 'नया दर्द'

पूरी हो वो प्यारी तमन्ना 
और हमारा सफ़र आसान हो 
ऐ हमसफ़र - ऐ हमसफ़र 

आज तन्हा है 'अजनबी' 
बाहों में लेकर रुला दो मुझे 
और हमेशा के लिए 
दूर कर दो तन्हाई - तन्हाई 

- मुहम्मद शाहिदमंसूरी 'अजनबी'
10th Dec. 04 '207'
This poem is dedicated to my beloved Aneesa , who come in my life very quickly plz..plz...

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