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Tuesday, April 15, 2014

उल्फत का सातवां चराग

इन सात चरागों से मुहब्बत की 
लौ निकल रही है 
हर एक चराग, हर एक साल को नज्र
इस वक़्त 
चाँद -तारे तो नहीं, मगर 
ढलती शाम है 
उल्फत की चांदनी है प्यार की बरसात है 
बस कुछ नहीं है, तो वो तुम नहीं हो 

तुम्हारी यादें हैं और हजरी मुलाकातें हैं 
तुम्हारा प्यार है मगर तुम नहीं हो 

यूँ तो हर इक साल की अपनी अलग 
दास्ताँ है , अलग फसाना है
मगर इस साल 
तुम्हारे उस गुलाब के दरमियाँ 
लिखा गया ये साल 
मासूम सा गुलाब ,चुप सी तुम 
और मुहब्बत से लबरेज , ये सात चराग 
बस कमी है तो तुम नहीं हो  !

हर साल लेके आये इक नया साल 
अनीसा- शाहिद की मुहब्बत बढती रहे 
साल दर साल 

क्या लिखूं ग़ज़ल, क्या लिखूं नज़्म 
जब सब कुछ ही तुम हो 
जमीं तुम हो आसमां तुम हो 
अनीसा तुम हो , शाहिद तुम हो 
बस अब क्या लिखूं 
जब मेरी दुनिया ही तुम हो !!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
5th Oct. 03, '188'

ये नज़्म वो नज़्म है. जो 5 Oct. 03, की ढलती शाम को लिखी गयी जब हम 5 Oct. 96 को पहाड़ों के ऊपर, और वादियों के दरमियाँ थे.
Yours & yours only
Shahid

ये वो 16 Oct. 03 के फूल हैं जो अपनी अलग दास्ताँ और अपनी अलग कहानी सुना रहे हैं. 16.10.03

जिस तरह Celebrate करना चाहता था, उस तरह न कर सका , खैर , प्यार, प्यार है
Everlasting  Love
Yours Forever
SHAHID
16th Oct. 03

1 comment:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।

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