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Saturday, April 26, 2014

मुझे इसी तखईयुल में जी लेने दो

इस गलत फहमी को
गलत फहमी ही क्यूँ नहीं रहने देते
मुझे इसी तखईयुल में जी लेने दो
ज़िन्दगी के कुछ पड़ाव और हैं बाकी
उन्हें भी यूँ ही गुज़र जाने दो
कम अज कम इस बहाने
ज़िन्दगी के कुछ लम्हात तो गुजर जायेंगे

तुम अपना साथ न बख्शो
ये अपने तखय्युल के
अहसास ही रहने दो
इस गलत फहमी को गलत फहमी ही रहने दो
मुझे जी लेने दो -  मुझे जी लेने दो

ये ज़िन्दगी का सफ़र
बड़ा तवील सा महसूस होता है
तेरे अहसास जिंदा हैं
तो मुझे जिंदा होने का अहसास है
कम अज कम इन्हें तो महफूज़ रहने दो
इसी बहाने हम जी लेंगे
मुझे जी लेने दो - मुझे जी लेने दो

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
11st Dec.12, '275'



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