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Saturday, April 12, 2014

नया दर्द


दर्द जब नया हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब जिस्म का हिस्सा हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब एक दास्ताँ हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब दर्द न होकर कुछ और हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब खल्वत का इक सामाँ हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब दो दिलों की डोर हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब ज़िन्दगी से उठकर हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब रुसवाई से तबस्सुम में तब्दील हो जाए
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब करवटों का सहारा हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब किताबों में लिखी ग़ज़ल हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब तेरी याद दिलाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द शाम हो और सहर भी हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब सीने की धड़कन हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब सरापा हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब ख्वाबों को मिठास दे जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब पागल हो और दीवाना हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब हाथों की लकीरों में बस जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द इक क़तरा हो और समुन्दर हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब बेवजह मुस्कुराहटें ले आये
तो कुछ अहसास होता है

दर्द जब निकहत और इमरोज़ दे जाए
तो कुछ अहसास होता है 

दर्द जब शाहिद और अनीसा को मिलाये 
 तो कुछ अहसास होता है 



दर्द जब नए साल में अजनबी हो जाये
तो कुछ अहसास होता है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
1st Jan. 03, '171'

चुप्पी

वो और मैं , और 
कमरे में खामोशी 
रात का सन्नाटा 
सफ़ेद रौशनी में 
चुपचाप 
दो दिलों की धडकनें
और कुछ जज़्बात 

कुछ यादों के सिलसिले 
कुछ ख़्वाबों के मकां
और कुछ ख्वाहिशों 
और तमन्नाओं का वजूद 

इक बहाने की तलाश कि
उनसे कुछ बोलेन , और 
उन्हें भी मेरे कहने का इंतज़ार 

इक अजीब सा आलम 
हम दोनों के दरमियाँ 
चुप्पी का दरीचा 
यहाँ भी बन्द और 
वहां भी चुप्पी टूटने 
कोई आसार नहीं 
बस! वो और मैं और 
कभी ख़त्म न होने वाली चुप्पी !!

- मुहम्मद शाहिदमंसूरी 'अजनबी'
19th Dec. 02 '170'

कैदे ज़िन्दगी से कहाँ इतनी फुर्सत मिलती है

कैदे ज़िन्दगी से कहाँ  इतनी फुर्सत मिलती है
ढेरों नफरतों के बाद जरा सी उल्फत मिलती है 

यादों की बौछारों से भीग जाते हैं दिल के तार 
आंसुओं की शक्ल में जरा सी दौलत मिलती है 

उसके तसव्वुर को मैंने पैकर की तरह माना है 
ज़िन्दगी की सारी रानाई उसके बदौलत मिलती है 

वो भी मिली, दुनिया भी मिली, खुशियाँ भी मिलीं 
बाद मिन्नतों के भी कहाँ ऐसी किस्मत मिलती है 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
29th Aug. 02, '169'

Friday, April 11, 2014

शहर दर शहर होते वीरान रहे

शहर दर शहर होते वीरान रहे
एक हम थे जो खुद से अनजान रहे

वो मेरे जिस्म की तलाश में था
हम उनके ताउम्र निगहबान रहे

तुम चलो साथ-साथ  साया बनकर
चाहे फिर क्यूँ न वो अहसान रहे

जिनकी धड़कन से है ज़िन्दगी मेरी
वो साथ हों तो सफ़र आसान रहे

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
20th Aug. 02, '168'

मेरे और उसके दरमियाँ इक ऐसी चीज है

मेरे और उसके दरमियाँ इक ऐसी चीज है
जो दुआओं और मिन्नतों से नहीं मिलती

खुशनसीबी में शुमार हो जाते हैं वो
जिन्हें ज़िन्दगी में ये चीज मिलती है

मेरे दिल में किया जिसने इसे पैदा
वो कोई और नहीं सिर्फ मेरी अनीसा है

धूप, शबनम, परछाईं रहे प्यार के 'शाहिद'
तड़प, बेबसी से घिरी मेरी अनीसा है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
15th June 02, '167'

प्यार पाने का नहीं खोने का नाम है

प्यार पाने का नहीं खोने का नाम है 
ज़िन्दगी अहसास नहीं जीने का नाम है 

हर इक दर्द समा जाए रगों में लहू की तरह 
इजहारे ग़म तो नाशुक्री जताने का नाम है 

उफ़ ये हिज्र की रातें और दिल की जलन 
हर इक करवट में उस दीवाने का नाम है 

निगाहों का फलसफा क्या पूछते हो 'अजनबी'
ये तो दिल की सिलवटें जताने का नाम है 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
20th Aug. 02, '166'

जां कुर्बान करने का हम में जज़्बा है

जां कुर्बान करने का हम में जज़्बा है
वतन पे मर मिटने का हम में जज़्बा है

तुम कहो तो पल में दुनिया को हिला दें
हम नौजवानों में वतन परस्ती का वो जज़्बा है

दिलों के शाखों को जो चूम आती है
मेरी क़लम की स्याही में वो जज़्बा है

राहे वतन है खुद को फ़ना कर ऐ 'अजनबी'
तुम्हारी हर इक सांस में वो जज़्बा है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
15th June 02, '164'

निगाहे भरम उठा दीजिये

निगाहे भरम उठा दीजिये 
फिर चाहे जुल्फें गिरा लीजिये 

तुमसे कुछ भी न कहेंगे सनम
बस अपना फैसला सुना दीजिये 

रूठ जाये न मुहब्बत का गुलशन 
अपने दामन में मुझको छिपा लीजिये 

इश्क़ का ज़हर पी लिया 'अजनबी'
अब मुहब्बत की कोई दवा दीजिये 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
18th July 02, '163'

सिर्फ, नाराजगी की खातिर

सिर्फ
नाराजगी की खातिर
प्यार के लिए
मुहब्बत के वास्ते
हर चीज लुटा सकता हूँ
ज़िन्दगी फ़ना कर सकता हूँ
बस तुम्हारे लिए
हाँ तुम्हारे लिए
सिर्फ तुम्हारे लिए

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
3rd Nov. 01, '162'

मेरा दिल कह रहा है

मेरा दिल कह रहा है
तुम जुरूर मिलने आओगी

मजबूरियों से करके बैर
और हालातों से अदावत
मगर
कैसे यकीं मैं कर लूं
तुम जुरूर आओगी
सौ वादे तोड़ के तुमने
इक वादा निभाया है !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
24th May 02, '160'

Composed in the Jhelam Express Train.

गहरा और गहरा मरासिम

जहाँ तुम्हारी नज़र जाए 
बस ख़ुशी नज़र आये 
खुशियों का हो सामयाना
खुशियों की हों दीवारें
हो आहट ख़ुशी की जिसमें 

 तबस्सुम के हों फूल सिवाए गुलमोहर 
इक ऐसा ही हो तुम्हारा घर
जहां उम्र का ये साल गुजर जाए 

'अजनबी' की है ये मुसलसल दुआ 
तन्हा न रहे तुम्हारा सफ़र 
अर्सों रहे इस घर से तुम्हारा 
गहरा और गहरा मरासिम  !! 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
2nd June ,02, '159'



चन्द बोतलें कतार बद्ध

चन्द बोतलें कतार बद्ध
किसी में पीला
किसी में सफ़ेद
किसी में काला पानी
धुआं सा आसमान
गर्द के गुबार में
एक अजीब सा शोर
जिस पर बहके हुए
थिरकते कदम

सारे मासूम चेहरे
लग्जिशों में तब्दील हो गए
उनके मुंह की मिठास
आज ज़हर में बदल गयी

उनके होठों तले से
दिल को चुभाने वाले
लफ़्ज़ों का
सैलाब उमड़ पड़ा  !

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
20th Nov. 01, '141'

एक दिन बुने थे कुछ सपने

एक दिन बुने थे कुछ सपने
अगली सुबह शुरू हुआ
सपने सच होने का सिलसिला
दोस्तों की दुआएं , खुद की मन्नतें
और अरमान भरा दिल लेकर
शुरू हुआ खुशियों का सफ़र
शाम आते-आते बिखर गए सपने
टूटा दिल और हम भी टूट गए

सब कुछ जाता सा रहा
भरम भी अब अपना न रहा
पहली बार न हुआ ऐसा
मेरे साथ अक्सर हुआ ऐसा

ख्वाब सजते रहे
किस्मत रूठती रही
हम ही थे एक पागल
जो उम्मीद लिए सोचते रहे

सहरा में भी कहीं होता है पानी
अरे नादां !
अब तक तुम किस जमाने में रहे !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी' 
26th May. 02, '158'

Composed at the famous medical store of Jhansi

Thursday, April 10, 2014

किताबों से दिल न बहला तो तेरे पास चला आया

किताबों से दिल न बहला तो तेरे पास चला आया
कुछ तेरी सुनने तो कुछ अपनी सुनाने चला आया

ये प्यार का रोग है कहाँ इसकी दावा मिलती है
इसीलिए तो कुछ लम्हे बिताने चला आया

तमाम उम्र सहरा में गुजरी है अपनी
वो प्यास समंदर में वुझाने चला आया

पूरी ज़िन्दगी नाराज़ रहा वो मुझसे
आख़िरी वक़्त है मनाने चला आया

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
18th Mar. 01, '157'

मेरी कोशिशों को वादा न समझना

मेरी कोशिशों को वादा न समझना 
प्यार का जुनूं  है सितम न समझना 

हर कश्ती की मंजिल है दरिया का साहिल 
मगर हर साहिल को अपना न समझना 

अक्सर रूह जाती सी लगती है मुहब्बत में 
दिल में ऐसा होने को तड़पना न समझना 

हर इक रात ले के आती है एक नया ख्वाब 
ये तो सपना है हक़ीकत न समझना 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
5th Oct. 01, '156'

मेरे काजल ने तुमको पुकारा है

मेरे काजल ने तुमको पुकारा है
मेरी पायल ने तुमको पुकारा है
मेरे महबूब आ भी जाओ
मेरे जिस्मों जां ने तुमको पुकारा है

मेरी हर सांस तुमको पुकारती है 
मेरी हर अदा तुमको पुकारती है 
मेरे दिल के मालिक आ भी जाओ 
मेरे लव , मेरे आरिज ने तुमको पुकारा है 

दिल बहलता नहीं खुद के मनाने से
न उल्फत का कोई नग़मा सुनाने से
मेरी ज़िन्दगी के सहर आ भी जाओ
रात के हर पहलू ने तुमको पुकारा है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
2nd Apr. 02, '155'

सारी -सारी रात जागती रहती हूँ

सारी -सारी रात जागती रहती हूँ
नींद नहीं आती करवटें लेती रहती हूँ

तारे गिन -गिन कर रात गुजरती है
तेरी यादों से प्यार करती रहती हूँ

छुआ था तुमने उन चूड़ियों को कभी
उन्हीं चूड़ियों को चूमती रहती हूँ

उस रात का इक -इक अहसास ज़िन्दा है
उसी अहसास को सोचती रहती हूँ

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
3rd Dec. 2000, '154'

साकी तेरा मयखाना कितना अजीब है

साकी तेरा मयखाना कितना अजीब है 
यहाँ रकीब भी होता हबीब है 

न शिवाले न कलीसा न हरम से है गरज 
यहाँ सब इक दूसरे के करीब है 

इनसां हो के करे  इनसां की जो खिलाफत
दुनिया की नज़र में वो तो रक़ीब है 

सोजे उल्फत से निजात दिला दे कोई 
शायद नहीं ऐसा कोई तबीब है 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
8th Oct. 01, '153'
 

कल तक था मैं जिसे जानता नहीं

कल तक था मैं जिसे जानता नहीं
आज आलम ये है दुनिया पहचानता नहीं

हुआ है पहली नज़र का असर
जिसे अब तलक था मैं मानता नहीं

किया है उसने मुझे रूबरू -ए- बहार
सिवाए खिजाँ के था कुछ जानता नहीं

हर दिल अजीज़ है रुखसार पे उनके
और मुझे कोई पहचानता नहीं

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
16th Apr. 01, '152'

कुछ इस तरह सोचो मेरे बारे में

कुछ इस तरह सोचो मेरे बारे में
लोगों को खबर न हो अपने बारे में

तू   मुझे देखे और मैं तुझे देखूं
समाये हों हम दुनिया के नज़ारे में

या ख़ुदा प्यार के दरिया को ऐसा मोड़ दे
हम दोनों हों दरिया के हर किनारे में

बस इतना हौसला बुलंद कर ऐ 'अजनबी'
न जरूरत हो किसी की तेरे सहारे में

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
3rd May .01 '150'
क्यूँ  इतनी तारीकी छाई है अपनी ज़िन्दगी में 
प्यार भी करता हूँ तो तारीक ज़िन्दगी में 

खुशियों के दरीचे से निकली थी चन्द शुआयें 
खो गया उनका वजूद तारीक ज़िन्दगी में 

किताबे मुहब्बत लिखी थी तसव्वुर के आईने से 
सिमट के रह गया हर वरक तारीक ज़िन्दगी में

हर सिम्त से उट्ठी थी वफ़ा की हवाएं 
तिनका नहीं आता नज़र तारीक ज़िन्दगी में 

मौजों की अंजुमन में बैठा है "अजनबी"
क्या सोचना कल के लिए तारीक ज़िन्दगी में 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'
17th Oct. 01, '149'

Composed in the truck, Returning journey from Jhansi



नई उम्मीदों '148'

नई उम्मीदों 
नई तमन्नाओं 
नई ख्वाहिशों के संग 
नए जोश के साथ 
नए शहर की 
नयी दुनिया में 
नए आग़ाज़ के 
नए अंदाज में
खूबसूरत अंजाम के लिए 
एक नया सफ़र 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
3rd Nov. 01, '148'

कुछ अशआर -8

1. यूँ गेसुओं के साए में अपने चेहरे को न छिपाया कीजिये 
    करीब न आओ मगर दूर से ही मुस्कराया  कीजिये 

2. लाख दे ज़माना  लाख पहरे मगर 
     दीवानों को मिलने से रोक न सकेगी 

3. किताबे मुहब्बत का हर उसूल उसने न पढ़ा होगा 
   वरना रोते-रोते वो हंस के दिखा देता

4. तुम क्या समझो , तुम क्या जानो 
  मुहब्बत क्या चीज होती है 
   बस इक वही समझता है मुहब्बत 
जिसकी नस-नस में मुहब्बत बसी होती है (01.04.02)

5.  न रही वो कसक ही बाकी 
   न रही वो तड़प ही ज़िन्दा 
    मुहब्बत हुयी ही रुसवा  
मुहब्बत परस्त हुए शर्मिंदा (17.06.02)

6.  ख़ुशी कहें या दर्द कहें 
   मुस्कराहट कहें या आंसू कहें 
  ज़िन्दगी तू ही बता दे आज 
तुझे क्या कहें ! क्या कहें ! (31.12.05)

7.  मेरा अपना अलग इक कायदा है 
   मगर उसका कोई फायदा नहीं 
    अशआर तो लिख दूँ  तुम्हें मगर 
   तेरे दिल में मेरे अशआर का पायदा नहीं 
 क्योंकि ................................................( 05.06.01)

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

कुछ अशआर -7

1. मैं तो तुम्हें इक पल भी भुला न पाऊंगा
    पर, तुम मुझे न भूल जाना यार
  ज़िन्दगी के सफ़र में तुम्हीं तो हो
जिसे चाहा है मैंने , मैंने ............

2. लवों को अपने हिला दो
   उल्फत का चमन महका दो
  अपनी आवाज़ से मुझे बुला दो
फिर सारी दुनिया भुला दो

3. जानकार हाले -दिल तुम्हारा
  जान गया हाले दिल अपना
  इक सांस में कह दूँ  सारा प्यार
  बस यही है अब मेरा सपना

4.  चाहे हो सुबह या
    हो चाहे प्यारी शाम
     जुवां पे आये कोई लफ्ज़
  तो आये मेरा ही नाम

5. गर होगा रब को मंजूर
तो मुलाक़ात होगी जरूर
ऐसा है मेरा यकीं और ऐसा विश्वास
कभी न कभी होंगे जरूर आपके पास

6. हम तुमसे जुदा न हों
   तुम हमसे जुदा न हो
  खुदा करे ऐसा कभी न हो

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
1st Dec. 1999

कुछ अशआर- 4

1. मत निहारो  ऐसे किसी को 
कहीं तुम्हारी उसे नज़र न लग जाए 

2. सब कुछ जानते हुए भी 
   क्यों हो तुम अनजान 
   कब जानोगी मुझे मेरी जान 
    चाहे तब तक निकल जाए शाहिद की जान 

3. अब किसे कहूं अपना और किसे पराया 
    जब तुम्हीं हो मेरे अपने तुम्हीं मेरे पराये 

4. काश अगर ऐसा होता 
    मैं तुम्हें सोचता तो तुम्हें देखता 

5. ग़म में हो तुम 
     ग़म में हैं हम 
    हम दोनों के ऊपर 
    दुनिया के हैं ये सितम 

6.  मेरी जान से प्यारी है जो जान 
   उसी जान पे कुर्बान है मेरी जान 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
27th Feb. 2000

कुछ अशआर- 2

1. दिन को न दिन कहता हूँ
   रात को न रात कहता हूँ
  कहता हूँ तो बस तुझे
  अपनी ज़िन्दगी की सुबह कहता हूँ

2. यादों ने छूकर तेरे दिल को
     पकड़ लिया होगा दामन तेरा
   जिसमें तस्वीर होगी तेरी
   और चेहरा होगा मेरा

3. क्या कहूँ तुम से
    क्या लिखूं तुम पर
   जब,
  मेरे दिल के ही एक  हिस्से हो
तुम! तुम! तुम!

4. कितना आसान है
  सपनों की दुनिया में जीना
  मुश्किल है तो,
 टूटे हुए सपनों का ग़म पीना

5. सामने जब वो आ गए मेरे
   देख के उनको अपना सर झुकाना पड़ा
   वो मेरे करीब थे बहुत
   न जाने क्यूँ  दूर से दिल बहलाना पड़ा

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी" 

Wednesday, April 09, 2014

कुछ अशआर- 1

1.  आज वो है खुशकिस्मत 
     जिसे कहते हैं आपका 
     आज आपके दामन में हों लाख खुशियाँ 
     पर न हो कोई ग़म 
    बस यही दुआ है "अजनबी" की 
आपके लिए- आपके लिए 

2. भेज रहा हूँ कुछ पंक्तियाँ 
  इन्हें समझना शाहिद 
लगाना इसे अपने दिल से 
न हो जाना इससे "अजनबी"

3. जब भी मेरे पास तन्हाई होती है 
  तू मेरे करीब होती है 

4. जिसे आदर्श बना के बनाते हैं शे'र 
बैठा है जब वो सामने तो कितनी है देर 

5. दर्द कभी लगता है 
तो कभी चुभता है 
लेकिन 
एक पल में 
जिस्म का हिस्सा बन जाता है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

2nd June, 1999

कुछ और आशआर -0

1. तुम धरती के माफिक, मैं गगन के नुमा
    इस जहां में रहे बस तेरा और मेरा ही बयां

2. जब थे अकेले
तो सोचते थे कब होंगे दुकेले
आज जबकि हो गए दुकेले
तो रोते हैं अकेले

3.  नहीं पी है मैंने शराब
फिर भी मैं नशे में हूँ
शायद ये नशा प्यार का नशा है

4. जितने सावन गुजर गए
वो तो सारे निकल गए
पर आ रहा है जो अब
इसे याद रखना हमेशा -हमेशा

5. मैं हूँ एक डोरी की तरह, तू है पतंग के सामान
 बस ऐसे ही पकड़े रहें हम दोनों एक दूसरे की कमान

6. हम चाहते हैं सिर्फ तुम्हें
 अब साथ निभाने से इनकार मत करना

7. उसका सनम उसे ले जाएगा अपने साथ
पर , अजनबी यूँ ही देखता रहेगा

8. ख़ुशी -ख़ुशी से दिन बीते और ख़ुशी-ख़ुशी से रात
पर पल-पल याद रखना मेरी हर बात

9. अजनबी से मिलकर
अजनबी भी
हो जाते हैं दोस्त
ये तो क़िस्मत है उनकी
जो, मेरे साए में हैं

10. न ही मुझे है भूख और न ही प्यास
       है अगर तो सिर्फ तेरी ही आस

11.वो बचपन की बातें करके कभी याद
      आती होगी जरूर आपको मेरी याद

देखते -देखते, उनको आईना

देखते -देखते, उनको आईना
न जाने क्या हुआ 
कि
अपने काजल से 
आईने पे ही 
मेरा नाम लिख दिया 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
14 Mar. 02 , '147'

एक शायर

एक शायर 
और कई हवाएं 
दूर तक फैला सन्नाटा 
हर सू तन्हाईयों के मकाँ 
है ख़ामोशी उनमें बयां 
न कोई चरिंदा 
न कोई परिंदा 
बस एक चाँद
और चाँद में उसकी महबूबा 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
16th Mar. 02, '146'

खुशियों का हो रास्ता

खुशियों का हो रास्ता
खुशियों का हो गुलशन
हों फूल ख़ुशी के उसमें
खुशबू हो ख़ुशी की जिसमें
कुछ ऐसा हो इस साल
जो याद रहे सालों साल

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
2nd Jan. 02, '144'

पूरे चाँद की रात

पूरे चाँद की रात 
वो और उसके तसव्वुरात 
चुपके-चुपके 
रात भर बातें करते रहे 
कभी नाराज़ हुए 
कभी  मुस्कुराए
यूँ चला ये सिलसिला 
कि सुबह के तारे निकल आये
मगर फिर भी 
अधूरा रहा सफ़र 
न पूरा हुआ ये सिलसिला 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
31st Oct., 01, '145'

ऐसी प्यारी- मेरी माँ है

खुद ग़म को सह के
हमको ख़ुशी देती है
ऐसी प्यारी- मेरी माँ है
मेरे दिल की धड़कन हो  जैसे
 ऐसी प्यारी- मेरी माँ है

गुलशन में हों जैसे फूल
दुनिया में ऐसी मेरी माँ है
है फूल की जो महक
ऐसा उसका प्यार है
फलक का कोई सितारा हो जैसे
ऐसी प्यारी- मेरी माँ है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
2nd Jan. 02, '143'

तारीक राहें

तारीक राहें
अजनबी रास्ता
न हमसफ़र
न कोई साया
जब भी सोचा
तेरा ही चेहरा नज़र आया
चलते - चलते जब थक गया
खुद को तेरे साथ पाया
फिर भी न आई मंजिल नज़र
तन्हाईयों को हाले दिल सुनाया

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी "

28th Feb. 2002 , '142'

Friday, April 04, 2014

मुद्दत बीत गयी



एक मुद्दत बीत गयी
उनको देखे हुए
मगर अब भी
मौजूद है
वो मुस्कराहट
मेरी आँखों में
मुस्काये थे
मुझे देखकर
जो कभी .
-    - मुहम्मद शाहिद मंसूरी “अजनबी”
23rd Jan. 02 ‘140’

पसंद न आये

लगती हैं तुझे अच्छी
चीजें अब तो तो खट्टी
पसंद न आये तुझे
कोई भी चीज मीठी
ये क्या हुआ ?
कब हुआ ?
कैसे हुआ ?
मैंने न जाना
तूने न जाना

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

Thursday, March 28, 2013

अपनी मुहब्बत का भरम तुम रख लेना



अपनी मुहब्बत का भरम तुम रख लेना
मेरे बिना जीना पड़े तो जी लेना

उरूजे इश्क़ पे भी मंजिले मक़सूद न मिली
दुनिया दे ज़हर तो खुशी- खुशी पी लेना 

किताबे जीस्त के हर वरक पे तुमको पाया है
लोगों से क्या शिकायत करूँ लवों को सी लेना 

दरियाए उल्फत में हलचल तो होगी जुरूर कभी
मगर ऐसी मौजों की परवाजों को तुम पी लेना

वज्मे उल्फत में यादों का दिया गर मचलने लगे
बाजारे दुनिया से दूर हो तन्हाई में जी लेना 



-मुहम्मद शाहिद अजनबी
 

Wednesday, November 14, 2012

पहचानने में समय न लगा

घुटने से ऊपर उसके कपड़े  थे 
कंधे से ऊपर उसके बाल थे 
दुपट्टा से कोई वास्ता  न था 
होठों  पे कोई कैमीकल लाल था 
चाल  में उसकी 
हवा के झोंके सी लहरें थीं 
अदाओं में उसकी नशा सा था 
मुझे पहचानने में समय न लगा
नए  ज़माने की 
वो आधुनिक लड़की थी !

-  मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
1st June, 2001, '138'
 

Tuesday, November 13, 2012

इश्क़े मुस्तफा

 जिस दिल  में इश्क़े  मुस्तफा नहीं 
अल्लाह की नज़र में वो दिल नहीं 

लाख करे वो सजदे मगर
कोई सजदा इबादत में शामिल नहीं 

हर लम्हा  हाथ में तस्वीह हो, जुबां पे कलमा
बेमुहम्मद के  ज़र्रा भर नेकी हासिल नहीं

शबो  रोज लगाए डुबकियां वो सागरे नमाज़ में
मगर ऐसे सागर का कोई  साहिल नहीं  

सुन्नियत  ज़िंदा है और ताकयामत ज़िंदा रहेगी
मार सके इसे जो ऐसा कोई कातिल नहीं

- मुहम्मद शाहिद  मंसूरी "अजनबी"
2nd Apr. 2001, '137'