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Saturday, May 31, 2014

एक अजीब रास्ता

एक अजीब रास्ता , अलग अलग सा
विलगित लगी मुझे
सूर्य की तड़पती धूप
सूनी गलियां, एक अजीब माहौल
सिसकते लोग,
किसी से डर, एक अजीब सी महक
अभी कोई आया , आकर गिर पड़ा
कोई न उसका , कोई न मेरा
फिर भी मैं उसका और वो मेरा
बंधनों का अटूट रिश्ता
दिल की लगी आज फिर से तड़पी
याद आई आज वो रूहानी कविता
किसी ने लिखी थी किसी के लिए
आज वो सार्थक हुयी
इसी कड़ी धूप में
कोई किसी का न यहाँ
फिर भी ढूंढता हूँ मैं
अपना यहाँ
ये मेरी कैसी सोच
कैसा कार्य
नहीं आया मेरे
समझ में

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी'

 इस कविता को लिखने में कृतज्ञ का सहयोग रहा
09. 05.99 '357'


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