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Thursday, August 18, 2011

बहना के लिए

कहता है भैया आपका कुछ आज
करता है बहना तुझे आज याद
न टूटे ये बंधन दोस्ती का
यूँ ही जुड़ा रहे ये रिश्ता खुशी का
न आये ग़म एक भी आपके पास

खुशियाँ आयें लाख बार
न आये कभी खिज़ां का मौसम
रहे हमेशा बहारों का मौसम
बस यही ख्वाहिश है एक "अजनबी" की
अपनी प्यारी बहना के लिए- बहना के लिए !
- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
21st, Apr., 2000, '57'

Wednesday, August 17, 2011

कब आओगी बहना मेरी

कब आओगी बहना मेरी
इंतज़ार करे है भैया तेरा
आप नहीं हैं यहाँ तो
भर गया है यहाँ सूनापन
कब होगा ये दूर
है ये कहना मुश्किल
मगर है ये तय कि
इक दिन

होगा दूर सूनापन, खुशियाँ लौटेंगी
कलियाँ खिलेंगी, फूल मुस्कुराएंगे
बस इंतज़ार है अब उस दिन का
जब आप मुझे भैया कह कर पुकारेंगी
और 'अजनबी' के क़रीब होंगी !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
16th, Aug., 1999, '56'


ग़मों से प्यार

तुमने तो प्यार किया था अपना समझकर
ठुकराया उसने तुम्हें इक अनजाना समझकर

इसे भाग्य का फैसला कहूँ
या किस्मत का खेल कहूँ

चाहता है जो रब होता है वही
मैं जो भी सोचूँ तुम जो भी कहो

था जो तुम्हारा अब हो गया पराया
उठ गया तुम्हारे सर से अब वो साया

होगा तुम्हें याद अब भी वो नज़ारा
खायीं थीं तुमने कसमें किये थे तुमने वादे
निकले सारे फरेब हो गए सारे झूठे

जीना तो पड़ता ही है दुनिया में
यादों के सहारे या दर्द के साथ

सीख लें वे ग़मों से प्यार और दर्दे जुदाई का सहना
यही है प्यार करने वालों से "अजनबी" का कहना

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
17th Aug., 1999, '55'

Tuesday, August 16, 2011

कागज़ पर उतार देता हूँ..

न तो हूँ मैं शायर
न ही हूँ मैं कवि
जो भी लिखता हूँ वो
अपने लिए- उसके लिए
अपनों के लिए और
अपने प्यारे मुल्क के लिए

जेहन में आता है
दिल से पूछता हूँ
क़लम से कह कर
काग़ज़ पर उतार देता हूँ

यही होती है मेरी कविता
यही होती है मेरी ग़ज़ल
यही होती है मेरी नज़्म
यही होती है है मन की पुकार
और मेरे दिल की जलन !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
12nd Aug, 1999, '54'

Saturday, August 13, 2011

ऐसा आखिर क्यों ?

किताबों में ढूँढा
लेखकों से पूछा
आसपास तलाशा
प्रेमियों से मिला
दिल के पास गया
मन से जवाब माँगा
इस सवाल का-
कि
दुश्मन है दुनिया क्यों
प्यार करने वालों की
लाख जतन करने पर भी
हासिल हुआ यही कि
दुनिया है बड़ी
बेरहम, बे- मुरब्बत
न ही समझती है ये
प्यार और न ही
प्यार करने वालों के जज़्बात
इसकी नज़र में तो
प्यार एक गुनाह और
सिर्फ गुनाह है
लेकिन क्यों
नहीं बताया ये किसी ने
दिल ने मेरे फिर कहा कि
ऐसा आखिर क्यों?

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी'
12nd Aug, 1999, '53'

Friday, August 12, 2011

अम्बर से ऊँचा

सागर से गहरा
अम्बर से ऊँचा
आंधी से तेज़
निशा से गहरा
सादिक से सफ़ेद
फूलों से सुन्दर
शबनम से नम
साँसों से गरम
सबसे जुदा
सबसे अलग
ऐसा मेरा यार है
ऐसा मेरा प्यार है
हाँ- हाँ
यही मेरा प्यार है !

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
12nd Aug., 1999, '52'

Wednesday, August 10, 2011

ज़िन्दगी से बेखबर रहा

तोड़ दी तुमने सारी कसमें
तोड़ दिए जीवन के लाखों वादे
भरम भी अब न रहा
तुम गए तो गए मगर फिर भी
मैं ज़िन्दगी से बेखबर रहा

छोड़ दूँ दुनिया या दुनिया में रहूँ
रहूँ आखिर तो कहाँ रहूँ
तुम नहीं क़रीब, न ही मेरे आसपास
कहूँ अब अपना मैं किसको ख़ास

याद तुम्हें पल-पल सताएगी मेरी
जानता हूँ मैं, समझता हूँ मैं
पर हूँगा मैं, न जाने किसके बीच में
मन में ढूँढोगी, तलाश करोगी सपनों में
लेकिन तस्वीर जरुर होगी मेरी
तुम्हारे दिल के आईने में !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी'
3rd Aug., 1999, '51'


Tuesday, August 09, 2011

सारी दुनिया से अन्जान

क्यों आती है जुदाई
क्यों मिलती है तन्हाई
किससे पूछूं किससे कहूँ
सारी दुनिया से अन्जान
अपने से अजनबी
फिर भी
मन में है इक लगन
कि वही है मेरा सजन
जो आँखों को रुलाये
दिल में दर्द जगाये।

हो दूर अब ये दूरी
न रहे कोई मजबूरी
मिले वो मुझसे आके
इन भीगी- भीगी रातों में
जिससे भीग जाये मेरा मन
और मेरा प्यारा सजन
पर किससे कहूँ कैसे कहूँ
जो बता दे जाकर उसे
कि
याद करता है तुझे इक "अजनबी"

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
31st Aug. , 1999, '50'


Sunday, August 07, 2011

मंजिल भी है सूनी

चाँद छिपा है बदली में
तारे भी नहीं हैं आसमां में
ऐसे में आ जाओ ऐ मेरे सनम
तुझे है मेरी चाहत की कसम
ऐ हवा जाकर जरा उनसे कह दे
बैठा है आज कोई तेरी आस लगाये

आज कुछ ऐसा है मानो
नहीं है कोई इस दुनिया में
ऐसे में तू आजा सनम
तुझे है मेरे प्यार की कसम
ऐ नज़ारे जाकर जरा उनसे कह दे
बैठा है आज कोई
तेरी तस्वीर को दिल से लगाये

रहें हैं सूनी, मंजिल भी है सूनी
है, बस रहा अँधेरा इनमें
ऐसे में आकर तू मुझसे मिल
न रुला अब और मेरा दिल
ऐ बरसात की बूंदें
जाकर जरा उनसे कह दे
बैठा है आज कोई
तेरी यादों से दिल लगाये !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
21st July, 1999, '49'

Thursday, August 04, 2011

वही है शबनम

अपनी तक़दीर का शुक्रिया
अदा मैं कैसे करूँ
जिसने दिया है मुझे ऐसा
जिसे सामने बिठा के
मैं तो उसे आँखों से प्यार करूँ

अपनी गोद में बिठा के
तारों से जिसकी मांग भरूँ
दिल में तमन्ना है मेरी
जब भी देखूं मैं अपने
दिल के आईने में
सिर्फ उसी का दीदार करूँ

वही है निशा
वही है शबनम
वही है डाली
वही है फूल
आखिर कैसे मैं उसे
जी भर के प्यार करूँ॥

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

20th July, 1999, '48'

नाज़ है हमें तुम पर

मेरे देश के वीर जवानों
फख्र है हमें तुम पर
नाज़ है हमें तुम पर

तुमने करके कुर्बान अपनी जान
बढाया है मेरे वतन का मान
पर इसे कभी होने न देना कम
गर हो गया ये कम तो
न रहेगा ये जहाँ न रहेंगे हम

लगाना है हमें गले जीत
नहीं लगाना हार
करना पड़े चाहे मुझे
मौत को जितना प्यार

बस मेरी तुमसे
यही है तमन्ना और
एक "अजनबी" की यही है आरज़ू!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

22nd July, 1999, '47'

मेरे जांनिसार

आँखों का नशा
होठों से पिला दे
छीन ले मेरा होशो हवास
कर दे मुझको पागल
कि बस


आँखों में हो तेरा चेहरा
दिल में हो तेरी तस्वीर
हो जाये मेरी ऐसी तकदीर

हों तेरी भावनाएं मेरे मन में
और मेरी भावनाएं तेरे मन में
ऐसा हो इक नया अहसास
कर सकूँ जिसे जी भर के प्यार

न मिले मुझे राहों में इक भी फूल
मिले चाहे सारे खार
लेकिन तुम
ऐसा ही करना मेरे जांनिसार !!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
13rd July, 1999, '45'

Wednesday, August 03, 2011

तू ही मेरी सुबह है

आंसू भरे होठों की कलम से
लिख दे मेरे दिल पर
तू अपना नाम- अपना नाम
कह सकूँ ताकि मैं
इस दुनिया के सामने
नहीं हैं हमारे अब दो नाम
हो गए हैं अब दोनों इक नाम
क्योंकि

तू ही है मेरी सुबह और
तू ही है मेरी शाम
है अगर तो
तेरा ही ख्याल
याद है तो तेरा ही नाम
ऐ
मेरे सनम
इक नहीं तुझे
कई -कई बार सलाम !

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

12nd July, 1999, '44'

फिर तुम न जाना कभी

तेरी जुल्फें संवार दूँ
तुझको निहार लूँ
पलकों पे बिठा के
दिल में सजा लूँ
फिर तुम न जाना कभी
मुझसे दूर हो के !

गालों को छू के
होठों को चूम लूँ
तेरे चेहरे को हाथों में लेके
अपनी गोद में रख लूँ
फिर तुम न जाना कभी
मुझसे दूर हो के !

आँखों को मिला के
जी भर के देख लूँ
अब करके थोड़ा प्यार
नशे में झूम लूँ
फिर तुम न जाना कभी
मुझसे दूर हो के !

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

1st July, 1999, '43'

Monday, August 01, 2011

जुल्फें तेरी उलझी- उलझी रहें

जुल्फें तेरी उलझी-उलझी रहें
आँखों की गहराई कम न हो
होठों की लालिमा हमेशा कायम रहे
हाथों में मेंहदी रची रहे

दुनिया में कुछ भी हो मगर
क़िस्मत की तू हमेशा धनी रहे
ग़म तुम से दूर-दूर रहें
खुशियों से तेरा आँचल भरा रहे

जिसे तुम दिल से चाहो
उसका प्यार बढ़ता ही रहे
दिल में तुम्हारे उसका दिल हो
जो हमेशा बनके धड़कन धडकता रहे

मन में तुम्हारे अरमां हो कि
"अजनबी" के पास तू हमेशा रहे।

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

1st July, 1999, '42'