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Friday, August 10, 2012

हवाओं की सरसराहट नहीं ये उनका कोई पयाम है

हवाओं की सरसराहट नहीं ये उनका कोई पयाम है
गुजरी थी उनके संग जो शाम आज वही शाम है

था मेरे इन हाथों में उसका हसीं चेहरा
आज उन्हीं हाथों में मय का जाम है

छेड़ी है उसके शहर में किसी ने आज ग़ज़ल
शायद लवों पे उसके आया मेरा नाम है

तड़पते देखा है मैंने मौजों को कश्ती के क़रीब
महसूस होता है मुहब्बत का यही अंजाम है

मयकदे में सुकूँ पाओगे तुम "अजनबी"
तेरी दीवानगी इस जहाँ में गुमनाम है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी"
5th Dec. 2000'128'

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