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Wednesday, November 16, 2011

पैग़ामे वफ़ा

मैंने उसे भेजा था पैग़ामे वफ़ा
उसने समझा है ये कोई बेवफा

खायीं थीं जिसने मुहब्बत की कसमें
भूल गए वो मुहब्बत की रस्में

छूती थीं फलक को जिनकी तमन्नाएँ
क्या हुआ हश्र अब हम क्या सुनाएँ

छोड़ के दामाँ मेरा उनके पहलू में आ गए
जिनसे हम खफा थे वो उन्हीं के हो गए

"अजनबी" दहर में कोई किसी का नहीं है
है अपना पराया, अपना अपना नहीं है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
15th June 2000, '90'

Tuesday, November 15, 2011

आ गया फिर जुदाई का मौसम

जा चुकी है कब की खिजां
आ गया बहारों का मौसम
मेरे ग़म फिर भी नहीं गए
कि आ गया फिर जुदाई का मौसम

इज़हारे मुहब्बत हुआ ही था
दिल में तमन्नाएँ जगीं ही थीं
हुआ ही था ईजाद ख्वाबों का मौसम
कि आ गया फिर जुदाई का मौसम

मिले ही थे दो दिल
धड़कना अभी बाकी ही था
छाया ही था प्यार का मौसम
कि आ गया फिर जुदाई का मौसम

चोरी कि मुहब्बत को चाहा था छिपाना
बाकी था अभी उनका मेरे वादों को निभाना
छा गया ज़माने की दुस्वारी का मौसम
कि आ गया फिर जुदाई का मौसम

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
23rd Apr. 2000, '89'

Monday, November 14, 2011

प्यार करना चाहता हूँ तुम्हें

प्यार करना चाहता हूँ तुम्हें
सारी दुनिया से छिपाकर
दिल में बसाना चाहता हूँ
हर नज़र से बचाकर

हर घड़ी आँखों से अपनी
देखना चाहता हूँ तुम्हें
अपने प्यार का आँचल उढ़ाकर

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
12nd June 2000, '88'

Sunday, November 13, 2011

लाख मुझे भुलाने की कोशिश करलो

लाख मुझे भुलाने की कोशिश करलो
पर मुझे पल भर न भुला पाओगी

जब भी आईने में खुद को निहारोगी
अक्सर मुझे और मुझे ही पाओगी

शाम की तन्हाई में होगी जब तन्हा
अपने को मेरे ख्यालों के रूबरू पाओगी

मुश्किल में होगा जब तुम्हारा दिल
मेरे नग़मों से अपना दिल बहलाओगी

रोक सको रोको ख्वाबों में मुझे
तन्हा रातों में "अजनबी" को जुरूर पाओगी

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
7th June 2000, '87'

तारों के झिलमिलाने से

तारों के झिलमिलाने से, चाँद के मुस्कुराने से
हमें उनकी मुस्कराहट याद आई

देखा जब मैंने चाँद को अपनी आँखों से
तो मुझे वो ही नज़र आयी

खो गया जब मैं ऐसे नज़ारे में
दिल में यादों की घटा छाई

किसी शायर की है वो शायरी
मेरे दिल में जो प्यार बनके आई

टूट जाएँ सारी हदें मिल जाएँ दो दिल
हो जाये दूर फिर ये तन्हाई

कितना खुशकिस्मत है तू "अजनबी"
जो तूने इतनी प्यारी महबूबा पाई

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
15th Dec. 1999 '86'

Friday, November 11, 2011

अश्कों की झड़ी होगी

ज़िन्दगी तू बड़ी बेवफा है
इक न इक दिन मुझे छोड़ देगी

अरमां हमारे कफ़न ओढ़ लेंगे
तमन्नाएँ भी दिल में न रहेंगी
वो घड़ी कितनी बदनसीब होगी

दिल रोयेगा और अश्कों की झड़ी होगी
आने जाने की हलचल सी मची होगी

चाहेंगे लिपट के रो लें किसी से हम
उस वक़्त अपनों की कमी होगी

क्यों कल के ताने बाने बुनता है "अजनबी"
वो घड़ी भी अपनी हमसफ़र होगी

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
12nd Dec. 1999, '85'

Thursday, November 10, 2011

मैं होता हूँ और मेरा जाँनिसार होता है

शाम हंसी करने क लिए
सोचता हूँ मैं ख्याल तेरा
आते ही ख़याल तेरा
दूर हो जाते हैं दिन के ग़म
और आती है ख्सुहियाँ लिए
इक प्यारी रात

जिसमें होती है तू और मैं
और दो दिलों की धड़कन
चांदनी का आँगन होता है
सितारों का आँचल होता है
हवाओं का प्यार होता है
शबनम का इज़हार होता है

मैं होता हूँ और मेरा जाँनिसार होता है
ख्वाबों की है ये दुनिया
ख्वाबों के हैं ये महल
मैं होता हूँ और मेरा प्यार होता है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
5th Nov. 1999, '84'

Wednesday, November 09, 2011

बिन तुम्हारे- बिन तुम्हारे

ऐ हवा
जाकर जरा
उन्हें बता
बुलाता है तुम्हें कोई शायर
अधूरी है उसकी ग़ज़ल
नहीं है पूरी कोई नज़्म
बिन तुम्हारे- बिन तुम्हारे

ऐ चाँद
जाकर जरा
उन्हें बता
जल रहा है मुहब्बत की तपिश में
डूब रहा है प्यार की कश्ती में
नहीं मिलेगा उसे कोई साहिल
बिन तुम्हारे- बिन तुम्हारे

ऐ नज़ारे
जाकर जरा
उन्हें बता
मचल रहा है तुमसे मिलने को
तड़प रहा है तुम्हें देखने को
थम जाएँगी उसकी साँसें
बिन तुम्हारे- बिन तुम्हारे

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
15th Dec. 1999, '83'

Tuesday, November 08, 2011

दो दिल बिछड़ रहे हैं यहाँ

दो दिल बिछड़ रहे हैं यहाँ
किसी को ख़बर भी नहीं है
दो दिल मचल रहे हैं यहाँ
किसी को ख़बर भी नहीं है

मिले थे जब हम दोनों तो
होश था इस दुनिया को
जुदा हो रहे हैं आज हम तो
किसी को ख़बर भी नहीं है

मिलते थे जब हम तो
जलता था ये ज़माना
आज टूटा है मेरा फ़साना तो
किसी को ख़बर भी नहीं है

दो दिल तड़प रहे हैं यहाँ
किसी को ख़बर भी नहीं है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
23rd Apr. 2000, '82'

Monday, November 07, 2011

ऐ साकी

ऐ साक़ी इतनी पिला दे मुझे आज
बाकी और प्यास न रहे

भूल जाऊं सारी दुनिया
कोई और होश न रहे

कुछ ऐसा नशा आ जाये मुझे
किसी और का इंतज़ार न रहे

फूलों से भर जाये मेरी ज़िन्दगी
बस अब इक भी खार न रहे

चाह है जिसे तूने "अजनबी"
उसके पास कोई ग़म न रहे

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
1st June 2000, '81'

Sunday, November 06, 2011

जिसे अपनी ज़िन्दगी बनाने चले थे

जिसे अपनी ज़िन्दगी बनाने चले थे
उसी से जुदा हो के चले हैं

खुशियों को दामन में समेट कर लाये थे
अश्कों की बरसात में भीग कर चले हैं

मुहब्बत की तिश्नगी में तबाह हुए
फिर भी यादों को छिपाकर चले हैं

आज उनका सेहरा फूलों से महका है
मेरी ज़िन्दगी में कांटे बो कर चले हैं

क्यों नाराज़ होता है उससे "अजनबी"
कुछ तो सोचकर बेवफाई करने चले हैं

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
30th May, 2000

Saturday, November 05, 2011

कुछ अशआर -6

1. दूर मुझसे रहके तड़पाते हैं वो
पास जब हों उनके तो
क़रीब आने में इतराते हैं वो
अब क्या करूँ ऐसा मैं वो
कि बाँहों मेरी आ जाएँ वो

2. मैं बारहा गुजरता हूँ उनकी गली से
दिल में ये हसरत लिए
कभी तो होगा दीदार उनका

3. होती है जो शाम
तो आता है सवेरा
होता है सिर्फ
इक रात का फेरा

4. जो नहीं है नशा सौ बोतल का
वो तेरी आँखों में है
जो गुलाब को होठों से लगाने में नहीं
वो तेरे होठों को अपने होठों से लगाने में है

5. तुम कहती रहो
मैं सुनता रहूँ
तुम बैठी रहो
मैं देखता रहूँ

6. होगा बस मान ही मान
बन जाओगे तुम सबकी शान
ओ, अपने मामा की जान
कैसे हो प्यारे रिज़वान

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी"
24th May , 2000

Friday, November 04, 2011

कुछ अशआर- 5

1.मेरे दिल में है इक दर्द
है मलहम जिसकी तू

2. हमें मिटाने वाले मिट जायेंगे
हम तो सितारा बनकर दुनिया को चमकाएंगे

3. तन्हा होते हुए भी तन्हा नहीं
तेरी यादों के साथ हूँ तेरे साथ नहीं

4. कह दो मन के मीत से मन की बात
कहीं मन में ही न रह जाये

5. इश्क़ को कब कौन रोक पाया है
हर किसी ने हर किसी से इसे जुदा पाया है
मिटाने की कोशिश की है जिसने इसे
खुद को उसने फना पाया है

6. मुहब्बत से जोड़ा है जो नाता
तो दामन छुड़ा सकता नहीं
जाँ लुटा सकता हूँ मगर
कदम हटा सकता नहीं

7. मैं वो परिंदा नहीं
जो उड़कर चला जाऊंगा
दिल में जो बैठा हूँ
तो उड़ाकर ही ले जाऊंगा

8.दिल के क़रीब, मन के पास
यादों के आईने में रहने वाले

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
24th May, 2000

Wednesday, October 19, 2011

बांहों की गोलाईयाँ थीं

चम- चम चमकता चाँद था
सितारों की झीमी रौशनी थी
हवाओं के झोंके भी थे
मौसम भी खुशगवार था
ऐसे में, मैंने उसकी मांग को सजाया था

दिल में धड़कन थी
मन में लगन थी
होठों पे हंसी थी
चेहरे पे ख़ुशी थी
ऐसे में, मैंने उसकी मांग को सजाया था

बांहों की गोलाईयाँ थीं
आँचल की परछाईयाँ थीं
हम दोनों की साँसें थीं
हम दोनों की आहें थीं
ऐसे में, मैंने उसकी मांग को सजाया था

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी"
18th Apr., 2000 '79'

Sunday, October 16, 2011

तो कम है

गर मैं तुझे अरमान कहूँ
तो कम है

गर मैं तुझे अपनी पहचान कहूँ
तो कम है

गर मैं तुझे अपना मन कहूँ
तो कम है

गर मैं तुझे धड़कते हुए दिल की धड़कन कहूँ
तो कम है

गर मैं तुझे अपनी ख़ुशी कहूँ
तो कम है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
14th May, 2000, '78'

Wednesday, October 12, 2011

तेरी चूड़ियाँ

खनकती होंगी तेरी चूड़ियाँ, खनकते होंगे तेरे कंगन
लेकिन तेरे पास नहीं तेरा साजन
बजती होगी तेरी पायल, बोलती होगी तेरी बिंदिया
लाख बुलाने पर नहीं आती होगी तुझे निंदिया

मेरी यादों को सोचते होगे
मेरी बातों को सोचते होगे
तन्हाईयों में छिपकर
मुझसे बातें करते होगे

जल्दी ही होगा दूर अब ये इंतज़ार
फूल ही फूल होंगे, नहीं होगा इक भी खार
जब भी तूने अपनी मांग को सजाया होगा
मेरा चेहरा जरूर तेरे सामने आया होगा

सारी दुनिया के सामने
इक दिन मैं आऊंगा
तुमसे ही तुमको चुराकर
डोली में बिठाकर ले जाऊंगा

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी'
18th Apr. 2000, '77'