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Thursday, July 19, 2012

लौटा दे फिर कोई वो दिन

हैं ये वो रास्ते
गुजरे थे जहां से हम तुम

खुशकिस्मत हैं ये रास्ते
गुजरे थे यहाँ से हम तुम
कितना हंसीं था वो समाँ
साथ थे जब हम तुम

गूंजती थी तुम्हारी हँसियाँ
लहराता था तुम्हारा आँचल
काश जाए फिर वो खुशियाँ
हो जाएँ साथ हम तुम

बातों - बातों में वो तेरा रूठ जाना
फिर मेरा वो तुझको मनाना
लौटा दे फिर कोई वो दिन
जाएँ क़रीब हम तुम

आँखें तुम्हारी नम थीं
होंठ भी तुम्हारे चुप थे
मुड़-मुड़ के देखा था तुमने हमें
हुए थे जुदा जब हम तुम

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
23rd July, 2000, '106'

2 comments:

  1. वाह! बहुत खूब लिखा है....

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  2. बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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