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Friday, November 11, 2011

अश्कों की झड़ी होगी

ज़िन्दगी तू बड़ी बेवफा है
इक इक दिन मुझे छोड़ देगी

अरमां हमारे कफ़न ओढ़ लेंगे
तमन्नाएँ भी दिल में रहेंगी
वो घड़ी कितनी बदनसीब होगी

दिल रोयेगा और अश्कों की झड़ी होगी
आने जाने की हलचल सी मची होगी

चाहेंगे लिपट के रो लें किसी से हम
उस वक़्त अपनों की कमी होगी

क्यों कल के ताने बाने बुनता है "अजनबी"
वो घड़ी भी अपनी हमसफ़र होगी

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
12nd Dec. 1999, '85'

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