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Monday, November 07, 2011

ऐ साकी

ऐ साक़ी इतनी पिला दे मुझे आज
बाकी और प्यास न रहे

भूल जाऊं सारी दुनिया
कोई और होश न रहे

कुछ ऐसा नशा आ जाये मुझे
किसी और का इंतज़ार न रहे

फूलों से भर जाये मेरी ज़िन्दगी
बस अब इक भी खार न रहे

चाह है जिसे तूने "अजनबी"
उसके पास कोई ग़म न रहे

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
1st June 2000, '81'

2 comments:

  1. बहुत अच्छी भावाभिवय्क्ति.....

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