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Tuesday, December 07, 2010

वो मेरे क़रीब थे

वो मेरे क़रीब थे
मैं उनके क़रीब था
ये तो मेरा नसीब था
कि

मैं इन हसीं लम्हों को
उसके साथ गुजार रहा था
धुली हुई चांदनी थी
रत अपने शवाब पर थी
तारे भी गवाही दे रहे थे
इन सब हालातों के मद्देनज़र
हम दोनों मुजरिम से बैठे हुए थे

चाँद अपनी चांदनी से पूछ रहा था
कि
ये कौन हैं?

सुबह शबनम भी निशा से कहती थी
कि
रात में कैसी थी ये हलचल ?
तारे नज़ारे
डालियों का हिलना, पत्तों की सरसराहट

चाँद चांदनी, सरे जग की रौशनी
कहते हैं हो के इक साथ
कल दो नयन थे इक साथ

जैसे ही आगे कुछ होने वाला था
कोई कुछ कहने वाला था
कि
जाने कैसे ये सुबह हो गयी
और मैं यूँ ही...............................

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

'9' 24th Jan. 1999

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