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Thursday, August 16, 2012

अभी-अभी तुम आये हो अभी जाने की कहते हो

अभी-अभी तुम आये हो अभी जाने की कहते हो
आँखों ने दिल भर के देखा नहीं और तुम जाने की कहते हो

कितने अश्क बहाए हैं मैंने इस लम्हे के इंतज़ार में
उन अश्कों को गिन पाए और तुम जाने की कहते हो

न जाने कितनी शबे फुरकत के बाद अता हुआ ये मिलन
उस मिलन से मिले नहीं और तुम जाने की कहते हो

बिखरीं हैं अभी जुल्फें माथे का पसीना सूखा नहीं
पल दो पल ठहरे नहीं और तुम जाने की कहते हो

निगाहों में मौजूद है अभी इश्क़ का सुरूर
वो सुरूर हल्का हुआ नहीं और तुम जाने की कहते हो

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
2nd Sep. 2000, '134'



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