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Saturday, December 10, 2011

देखते हैं किताबों में तुम्हें

देखते हैं किताबों में तुम्हें
पाते हैं बातों में तुम्हें

लाना चाहता हूँ मैं
हर रोज़ ख्वाबों में तुम्हें

सजाना चाहता हूँ मैं
अपनी पलकों पे तुम्हें

हर घड़ी आँखों से अपनी
प्यार करना चाहता हूँ तुम्हें

मेरी ज़िन्दगी में जाओ हर सू
छिप-छिप के देखना चाहता हूँ तुम्हें

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
1st July, 2000, '96'

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