Followers

Tuesday, June 29, 2010

इश्क़ और बदनामी

इश्क़ और बदनामी हमेशा साथ- साथ चलते हैं
जब मंजिल है एक तो हमराही रास्ते क्यूँ बदलते हैं

आज की दौलत और बस आज का है वजूद
वरना कल तो हम सब सिर्फ हाथ मलते हैं

उसे मिली शोहरत, इज्ज़त और मिला ओहदा
अरे जनाब आप बेवजह क्यूँ जलते हैं

ज़िन्दगी बिखर जाने का ग़म कैसा है "अजनबी"
हर शाम को सूरज की तरह हम भी ढलते हैं

-मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी" 10th March. 2004, '182'

with the co operation of Alok

कहाँ हैं

कहाँ हैं वो कसमें , कहाँ हैं
कहाँ हैं वो वादे
जो किये थे तुमने कभी
खुले आसमां के नीचे ...... कहाँ हैं

कहाँ हैं वो सिसकियाँ
कहाँ हैं वो मुस्कराहटें
जो महसूस की थी तुमने कभी
चांदनी के साए में......... कहाँ हैं

कहाँ है वो रूठना
कहाँ है वो मनाना
अपने हाथों से वो
खुद का झूठा खिलाना.......... कहाँ है

कहाँ है वो रातों का आलम
कहाँ है वो आंधी का मौसम
सरे आलम से हो के निहा
खिलता जब मुहब्बत का मौसम ...... कहाँ है

कहाँ है वो पलकों का झुकना
कहाँ है आँखों का बेवजह रुकना
दिल ही दिल में दो दिलों का
वो पल भर का हँसना...........कहाँ है

काश वक़्त रुक जाता वहीँ ठहरकर
शायद खुश होता "अजनबी" रोकर
अब कहाँ से लाऊं गुजरे ज़माने की दुनिया
जो जा चुकी है मुझे छोड़कर....................... कहाँ है !!!

-मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी" 3rd May, 2003, '185'

This poem is very effective in my life . it is very sweet & touchable poem for my life.

उल्फत का साहिल

वो कहते - कहते चुप हो जाना तेरा
मेरी हलकी सी झिझक और शर्मना तेरा

वो माजी की बातें और उल्फत का साहिल
ऐसे आलम में अश्कों का आना तेरा

वो बाहें, वो गेसू, और वो प्यारे से आरिज
और फिर इसके दरमियाँ मुस्कुराना तेरा

अब तो ज़िन्दगी की हर दीवार उजड़ी है "अजनबी'
जब तक हासिल नहीं उल्फत का सामयाना तेरा

-मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

 15th Sep. 2003 
'189'
This Poem is composed in The Barauni- Gwalior Train.

फुरकत में हमसफ़र

हर किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
जो भी सोचो वो अक्सर नहीं मिलता

तुम खफा होने की बात करते हो
वो कभी नज़र भर नहीं मिलता

हिज्र की रातों में चांदनी ने साथ दिया
वरना फुरकत में हमसफ़र नहीं मिलता

मेरे दिल को थी जो कायनात मंजूर
दोनों आलम मिले वो मगर नहीं मिलता

-मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
'191' 5th May, 2002

दायरा दोस्ती का

दायरा दोस्ती का और मुहब्बत की बातें
वो रोज कहते हैं कोई ग़ज़ल सुना दें

कैनवस पर तुमको उतरना तो है मुश्किल
कहो तो अल्फाजों में तुमको बना दें

रूठ जाने का सबब पूछे बिना ही
निगाहों में ही वो मुझको मना लें

मेरी ज़िन्दगी का सफा पलट के देखो
दस्ताने इश्क का नगमा सुना दें

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी'
'193' 27th Aug. 2002

काश पानी पे लिखी

काश पानी पे लिखी अपनी मुहब्बत होती
बिछड़ने का ग़म न मिलने की शिद्दत होती

गुलमोहर के फूलों सी आँहें हमारी तुम्हारी
दिन में बेचैनी न रातों को क़यामत होती

किताबे माजी के पन्ने पलटने से क्या फायदा
पहले सोचा होता शायद न ये मुहब्बत होती

मेरे इशारों को समझने में वक़्त लगा दिया
वरना आज वो मेरी अपनी अमानत होती

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी'
'195' 27 Mar., 2004

Monday, June 28, 2010

अफ्सुर्दगी

वो जोशो- जुनूं
वो कामयाबी का परचम
शायद नहीं रहा
अब मेरे हाथों में

वरना आज घबराहट के बजाये
मुस्कराहट मेरे साथ होती
चेहरे पे उदासियों की लकीरें नहीं
रानाईयों और उमंगों का मजमा होता
यहाँ- वहां भागकर ज़र्रा भर
ख़ुशी की जुस्तुजू न होती

खुशियों के शजरों के
दरमियाँ खड़ा होता
कोई किस्मत की बात कहता है, तो
कोई हाथ की लकीरों का खेल

ये तो वक़्त का तकाजा है
जो आज ये दिन दिखा रहा है
ये लिखकर तू चन्द लम्हों का
दर्द दूर कर सकता है ऐ "अजनबी'

गर हमेशा को दूर करे ये ग़म
ये दर्द, ये अफ्सुर्दगी!
तो मैं जानूँ
कि तू - शायर है
ऐ अजनबी!!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी" '201' 21st May., 2004
In VI sem, that sem wrote a dark story for my life. but for short time.  

शाम

ग़म भी हैं जो अब रुकने का नाम नहीं लेते
अगर ऐसी है बात तो उन्हें क्यूँ थाम नहीं लेते

शायद हल्का हो जाये ज़िन्दगी का सफ़र
मयकदे का दामन क्यूँ थाम नहीं लेते

समन्दर का साहिल, न राही न मंजिल बस तुम
यार खोई हुई ऐसी तुम क्यूँ शाम नहीं लेते

हँस- हँस के खुद को धोखा देते हो "अजनबी'
भरी महफ़िल में मय का क्यूँ जाम नहीं लेते

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
'209' 10th May. 2005

नात

हर क़तरा इश्के मुस्तफ़ा से लबरेज हो जाये
मैं रहूँ न रहूँ ये दिल मुस्तफ़ा का हो जाये

दोनों आलम के ख़फा होने की तमन्ना नहीं
मगर मेरा हर सफा मुस्तफ़ा का हो जाए

ज़र्रा भर ज़र नहीं चाहिए मुझे या रब
मेरी सांस का हर हिस्सा मुस्तफ़ा का हो जाये

दुनिया में नाम कमाकर क्या करोगे "अजनबी"
या अल्लाह आखिरत में मुस्तफ़ा का साथ हो जाये

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
'219' 20th June, 2005

आखिरी ख़त

आज मैंने उसके नाम आख़िरी ख़त लिखा
जो कभी नहीं कुछ ऐसा आज तमाम लिखा

मौजों की अंजुमन से दिल के मकाँ को
मैंने अन्जान सा इक ऐसा पयाम लिखा

जाने क्यूँ सारे रिश्ते तोड़ दिए उस माहताब से
आज उस आफ़ताब को आखिरी सलाम लिखा

मेरी लग्जिशों पर रिन्द तनक़ीद करने लगे
और मैंने उसे ज़िंदगी का आख़िरी जाम लिखा

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
'223' 27th July, 2003

बहलाओ तो जानें

गुल से मुहब्बत सब करते हैं, खार से दिल लगाओ तो जानें
रो- रो के ज़िन्दगी सब जीते हैं, हँस के दिल बहलाओ तो जानें

चुपचाप पानी में कश्ती हर कोई निकाल लेता है
तुम मौजों से लड़कर, साहिल पे आओ तो जानें

दोस्त को गले लगाने में कोई नहीं हिचकता यारो
तुम अपने दुश्मन से हाथ मिलाओ तो यारों

यारों के दरमियाँ हर कोई हँस के दिखा देता है
तुम तन्हाई में हँस के दिखलाओ तो जानें

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

'227' 1st Apr. 2005

दिल, दर्द अहसास

इज्ज़त बढाकर खुद मुझको सरेआम करते हो
क्यूँ इस बदनाम को और बदनाम करते हो

आजकल अँधेरे में गुजर रही है ज़िन्दगी अपनी
चन्द शुआयें बची हैं उन्हें भी शाम करते हो

दिल, दर्द, अहसासों से बड़ा रिश्ता रहा अपना
आज भरी महफ़िल में उन्हें क्यूँ नीलम करते हो

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी'
28th Sep. 05, '270'

Friday, June 18, 2010

समर्पण

तुम्हें क्या करूँ अर्पित
और क्या न करूँ समर्पित
जब हर सुबह, हर शाम
तुम्हारा है।

ये साँसों का बहकना, दिल का मचलना
तुम्हारा है।

मेरे पास रह ही क्या गया है
सिवाए उसके
मेरे पास नहीं है कुछ, उसके पास है सब कुछ
क्योंकि
जो नहीं है मेरे पास
वो है उसका खास
मेरी आशा है ऐसी
कि

मुझे प् के वो, प् लेगी
दुनिया कि सारी ख़ुशी
लेकिन जब मैं गौर करता हूँ, एक नज़र
अपने दिल के ऊपर
तो अहसास होता है
कि
मेरे पास ये कमसिन दिल
और ये पागल मन अब भी है
अब बता दे तू ही
कि
मैं तुझे क्या भेंट करूँ
क्या न करूँ?

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी" कोंचवी

14th Jan, 1999, '6'

इंतजार

था जिस घड़ी का इंतजार
लो वो घड़ी आ गयी
मगर साथ में कुछ पानी की बूँदें लाई
ये पानी की बूँदें नहीं , ये तो ख़ुशी के आंसू हैं
ख़ुशी इसी बात की, कि इनमें कुछ ग़म के आंसू हैं

ये आंसू सुना रहे हैं दर्दे मुहब्बत उसकी
जो घिरी हुई है मजबूरियों जैसे पहाड़ों से
मुश्किल है निकलना उसका इन दीवारों से

मगर मैंने कह रखा है उससे
यही तो लड़ना है ज़िन्दगी से
मुझे विश्वास ही नहीं पूरा भरोसा है
कि वो मेरा साथ निभाएगी

जब तक कि मैं रहूँगा इस दुनियां में "अजनबी' बनकर
वो मेरा साथ देगी निशा बनकर

मेरे लिए बग़ावत करेगी वो दुनिया से
लड़ेगी, संघर्ष करेगी और पा लेगी मुझे

ईश्वर करे आसां हों ये काँटों के रस्ते
नव वर्ष पर यही दुआ है 'उसके' लिए!!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी"अजनबी' कोंचवी
1st Jan , 1999, '5'

Thursday, June 17, 2010

नमन

मेरे प्रिये मित्र नमन
रहे तुम्हारे पास हमेशा अमन
करते हैं तुमसे कई आशाएं
मेरे दिल में तुम्हारे लिए हैं कई भावनाएं

उनमें से एक
लक्ष्य है तुम्हारा जो
याद रहे हमेशा वो
क्योंकि
जीवन के इस चक्र में
कई गर्त हैं
तुम्हें गर्त नहीं
अपनी मंजिल को देखना है

पर मेरे यार इन सब भंवर में
न भूल जाना अपने
इस साथी को
जो साथ है तुम्हारे तब से
जबकि
शायद हम दोनों ने जीने का
सलीका सीखा था

बर्थडे पर तुम्हारे
साहित्य से हमारे
अर्पित हैं दो पंक्तियाँ
जो सामने हैं तुम्हारे!!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी" कोंचवी

23rd, Jan 1999, '4'

लानत

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर
जो हो न सका फ़िदा इस देश पर
मौका मिला सुहावना
जाँ देने का इस देश पर
जो हो न सका कुर्बां इस देश पर

मौका निकल गया
हाथ उसका खाली समझकर
उसने भी भुला दिया
उसे सपना समझकर

गर हो जाता वो
शहीद इस देश पर
याद किया जाता उसे उनमें
जिन्होंने सींचा है इसे अपने
लहू और पसीने से

याद आती है जब उनकी
तो ये आँख हो आती है नाम
मन में उनकी
आकृतियों को देखकर
शायद दुर्भाग्य था उसका
किसी तरह बदल गया था मस्तिष्क उसका!!!

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी"अजनबी"

23rd Apr, 1999, '3'