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Thursday, December 15, 2011

बहता हुआ आब हो तुम

दिल ने जिसे चाहा था
होठों ने जिसे पुकारा था

वही तस्वीर हो तुम
ख्वाबों की तामीर हो तुम
उल्फत के दरिया में
बहता हुआ आब हो तुम

तसव्वुर है तुम्हारा
तमन्नाएँ हैं तुम्हारी
तबस्सुम भी है तुम्हारी
मगर तुम हो हमारी

गर देख लूं तुम्हें
तो जाये खुमार
इकरारे इश्क़ कर लूं
फिर करूँ ज़िक्रे यार

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
2nd July, 2000 '98'

Saturday, December 10, 2011

नात

अरमाँ है इक दिल में कि
कभी उनका रोज़ा देखने जायेंगे

आएगा कभी वो दिन जब कि
खुद को रोज़ा के रूबरू पाएंगे

या रब इक बार चौखट पर सर रखने का अरमाँ हो पूरा
हम तो बस रोते और रोते ही जायेंगे

रखता हूँ दिल में आशिक़े मुहम्मद कहलाने कि तमन्ना
दुनिया वाले दें चाहे जितने ग़म हँस के सह जायेंगे

कब्र को चीर कर आयेंगे जब मुनकरनकीर
हम तो बस बारहा दरुदे पाक गुनगुनायेंगे

हश्र में होगा गुनाहों से लदा जब ये "अजनबी"
मेरे आका ज़रूर मेरी शफा-अत फरमाएंगे

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
25th June 2000, '97'

देखते हैं किताबों में तुम्हें

देखते हैं किताबों में तुम्हें
पाते हैं बातों में तुम्हें

लाना चाहता हूँ मैं
हर रोज़ ख्वाबों में तुम्हें

सजाना चाहता हूँ मैं
अपनी पलकों पे तुम्हें

हर घड़ी आँखों से अपनी
प्यार करना चाहता हूँ तुम्हें

मेरी ज़िन्दगी में जाओ हर सू
छिप-छिप के देखना चाहता हूँ तुम्हें

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"
1st July, 2000, '96'